दृष्टिकोण: रामनगर मंथन से निकला 2022 में 60 प्लस सीट जीतने का लक्ष्य पर पहाड़ पॉलिटिक्स में हवा में महल कहां बनते हैं!

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(पवन लालचंद): निःसंदेह मौजूदा दौर की भारतीय सियासत में मोदी-शाह जैसा करिश्माई चेहरा और चतुर चुनाव रणनीतिकार बाकी किसी दल के पास नहीं। लेकिन इस सबके बावजूद ये भी उतना ही खरा सच है कि इसी नेतृत्व द्वय को 2014 और 2019 के राष्ट्रीय चुनावों की बड़ी विजय के साथ-साथ कई बुरी हार के नतीजे भी पचाने को मजबूर होना पड़ा है। 2014 के तुरंत बाद दिल्ली और बिहार और 2019 जीतने के बाद फिर सबकुछ दाव पर लगाकर दिल्ली की हार। पश्चिम बंगाल की हालिया हार का जख्म तो अभी ताजा-ताजा हरा है और इसे भरने में अरसा लगेगा।
2017 में यूपी और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत की जीत ने बीजेपी को सियासी फलक पर पहुँचाने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। लेकिन पांच साल गुज़रने को हैं और वक्त उसी इम्तिहान के दौर से फिर रूबरू होने का है। पार्टी ने फिर यूपी में 350 प्लस का टारगेट रख दिया है और धीरे-धीरे यूपी में पार्टी की चुनाव मशीनरी की नब्ज पर गृहमंत्री अमित शाह हाथ भी रखने लगे हैं, संभव है आगे उनको ही यूपी में 2022 में 2014, 2017 और 2019 जैसा करिश्मा दोहराने को कहा जाए।
इधर उत्तराखंड बीजेपी ने भी रामनगर में तीन दिन( 27-29 जून) चिन्तन-मंथन कर ये सियासी अमृत हासिल किया कि वह 2022 में उत्तराखंड में सत्ता में दोबारा वापसी कर ‘बारी-बारी सत्ता हिस्सेदारी’ के चार चुनाव से चले आ रहे मिथक को तोड़ डालेगी। न सिर्फ मिथक तोड़ डालेगी बल्कि 2017 से ज्यादा यानी 60 प्लस सीटें जीतकर दिखाएगी। जाहिर है चुनावी जंग में हर दल अपना एक लक्ष्य लेकर उतरता है और फिर बीजेपी तो चुनावी दंगल में उतरने से पहले ऊँचा या कहिए विरोधियों के अपने लिए भी अकल्पनीय समझे जाने वाले लक्ष्य का ऐलान करने के लिए जानी जाती है। ये भी सच है कि पिछले सात सालों में उसने राष्ट्रीय और प्रादेशिक चुनावों में विरोधियों के लिए अकल्पनीय रहे ऐसे लक्ष्य जीत के तौर पर हासिल भी किए लेकिन इस हाई टारगेट के साइक्लॉजिकल वॉरफेयर के मीडिया घोषित चाणक्य अमित शाह गुज़रे सालों में कई झटके खाकर अब इस दाव में बेदम नजर आने लगे हैं।
2017 के यूपी और उत्तराखंड चुनावों में बहुत बड़ी जीत के बाद ऐसे अकल्पनीय टारगेट बीजेपी और शाह सेट चुनाव दर चुनाव जरूर करते रहे लेकिन सामान्य जीत या करारी हार के आँकड़े बेताल बनकर पीठ पर बोझ बढ़ाते गए हैं।
अभी हाल में बंगाल के हाई वोल्टेज चुनाव में अमित शाह ने विधानसभा की 294 में से 200 प्लस सीट का टारगेट तय कर आक्रामक कैंपेन कुरुक्षेत्र छेड़ा लेकिन ममता बनर्जी ने ‘खेला होबे’ कर दिया। असम में सत्ता में वापसी कर बीजेपी ने इतिहास रचा लेकिन 100 प्लस टारगेट हासिल न हो पाया। लोकसभा चुनाव जीतकर हरियाणा का सियासी कुरुक्षेत्र जीतने निकली बीजेपी ने विधानसभा की 90 में से 75 प्लस सीट जीतने का लक्ष्य रखा लेकिन चुनाव बाद बहुमत की सरकार के लिए जेजेपी की बैसाखी का सहारा लेना पड़ा। दिल्ली विधानसभा में सबकुछ दाव पर लगाकर 48 प्लस टारगेट के मुकाबले मुंह की खानी पड़ी। तेलंगाना में 119 में से 60 प्लस सीट टारगेट हवाई रहा।
उत्तराखंड के साथ बने झारखंड में लोकसभा चुनाव2019 में और ताकत हासिल कर लौटी बीजेपी ने विधानसभा की 81 में से 65 प्लस सीट जीतने का लक्ष्य रखा। लेकिन न सिर्फ उसकी सरकार गई बल्कि सीटिंग सीएम रघुबर दास अपनी परंपरागत सीट से ही बुरी तरह हार गए। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले बीजेपी ने राजस्थान की 200 में से 180 प्लस सीट जीतने का टारगेट रखा लेकिन वहां सरकार कांग्रेस की बन गई। यही हाल मध्यप्रदेश में हुआ हालांकि सिंधिया की टूट के ज़रिए वहां बाद में शिवराज सरकार बनी है।
उत्तराखंड के साथ बने एक और राज्य छत्तीसगढ़ में तो लक्ष्य के मुकाबले बीजेपी की और बुरी गत हुई। विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 65 प्लस सीट जीतने का लक्ष्य रखा लेकिन वहां 68 सीट कांग्रेस जीत गई जबकि वहां 2013 में झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर कई नेता मारे गए थे जिससे कांग्रेस नेता विहीन दिख रही थी जबकि सामने रमण सिंह जैसे मजबूत चेहरे थे जो लगातार तीन बार यानी डेढ़ दशक से मुख्यमंत्री थे। यहाँ तक कि यूपी और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के बाद दिसंबर 2017 में मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में अमित शाह ने 150 प्लस सीट का लक्ष्य रखा लेकिन पार्टी को महज डबल डिजिट यानी 99 सीटों की मामूली जीत से संतोष करना पड़ा था।
साफ है मोदी-शाह के रहते राज्यों में अपने तय किए बड़े चुनावी लक्ष्यों के मुकाबले बीजेपी को कई शिकस्त खानी पड़ी हैं और गुज़रे वक्त में ऐसे नतीजों की तादाद बढ़ती गई है। ऐसे में रामनगर चिंतन-मंथन में बाइस में विरोधियों पर न सिर्फ इक्कीस साबित होने बल्कि 2017 से बड़ी जीत लेकर लौटने का दावा पहाड़ पॉलिटिक्स में कितना जमीन पर उतरता दिखेगा इसके लिए ऊपर गिनाए नतीजों से पहले सूबे के सियासी सूरत-ए-हाल देखकर सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अभी तो सत्ताधारी पार्टी को चार साल जिसे मुख्यमंत्री रखा और फिर अकस्मात हटा दिया गया, उसी उलटफेर के कारण गिनाने नहीं आ रहे फिर चुनौती ये भी रहेगी कि वोट पांच साल के काम पर माँगने हैं या चंद महीनों पर जनता को मेहरबान होते देखने की चाहत है। वैसे किसी ने ठीक ही कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने देहरादून के परेड मैदान में 2017 के चुनाव में डबल इंजन सरकार के लिए वोट माँगा था लेकिन ये किसी को अंदाज़ा न था कि डबल इंजन सूबे के भीतर से ही पांच साल में दो बार लगाए जाएंगे! चार साल इंजन के तौर पर रहे टीएसआर-1 और अब टीएसआर-2 यानी सीएम तीरथ सिंह रावत! असल कहानी तो नवंबर में मोदी जब आएंगे खुद ही बताएंगे, बल!


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