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Renaming places in Lahore: अपनी स्मृतियों की ओर लौटता लाहौर!

क्या लाहौर अपने भूले हुए इतिहास को वापस बुला रहा है, या यह सिर्फ सांस्कृतिक पर्यटन और राजनीतिक प्रतीकवाद की नई रणनीति है?

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अपनी स्मृतियों की ओर लौटता लाहौर!
क्या लाहौर अपने भूले हुए इतिहास को वापस बुला रहा है, या यह सिर्फ सांस्कृतिक पर्यटन और राजनीतिक प्रतीकवाद की नई रणनीति है?

अड्डा फीचर। पाकिस्तान का सांस्कृतिक शहर लाहौर इन दिनों सिर्फ इमारतों की मरम्मत नहीं कर रहा, बल्कि अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को भी फिर से जीवित करने की कोशिश में लगा है। पंजाब की मरियम सरकार ने लाहौर शहर की पुरानी सड़कों, मोहल्लों, ऐतिहासिक संस्थानों और बाज़ारों के मूल नाम बहाल करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। यह पहल केवल नाम बदलने की प्रशासनिक कवायद नहीं मानी जा रही है, बल्कि इसे विभाजन, इस्लामीकरण और राजनीतिक दौरों में दब चुकी सांस्कृतिक परतों को फिर से सामने लाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

पाकिस्तानी अख़बारों के अनुसार, इस योजना पर एक उच्चस्तरीय बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज  ने चर्चा की। बैठक में तय हुआ कि लाहौर की कई ऐतिहासिक सड़कों, गलियों और पुराने कॉलेजों के मूल नाम वापस लाए जाएंगे। पाकिस्तान से लेकर भारत तक बुद्धिजीवी इस पहल को देर से ही सही लेकिन अच्छा प्रयास बता रहे हैं।

पाकिस्तान से आई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जिन नामों पर चर्चा हो रही है उनमें कृष्ण नगर, राम गली, धर्मपुरा, मॉल रोड और मोहनलाल बाज़ार जैसे नाम शामिल हैं, जिन्हें अलग-अलग सियासी दौर में बदला गया था। उदाहरण के तौर पर कृष्ण नगर को इस्लामपुरा, धर्मपुरा को मुस्तफाबाद और राम गली को रहमान गली कर दिया गया था। इसी तरह मॉल रोड का आधिकारिक नाम शाहरा-ए-कायद-ए-आज़म रखा गया था, लेकिन आम बोलचाल में लोग अब भी उसे “मॉल रोड” ही कहते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान में इस पहल को केवल “हिंदू नामों की वापसी” की तरह नहीं देखा जा रहा। कई अख़बारों और सांस्कृतिक मंचों ने इसे “लाहौर की बहुस्तरीय पहचान” को पुनर्जीवित करने की कोशिश बताया है। रिपोर्टों में बार-बार यह बात सामने आई कि लाहौर पर मुस्लिम, सिख, हिंदू और ब्रिटिश, सभी दौरों की छाप रही है और शहर की असली आत्मा इन्हीं परतों के मेल से बनती है।

इसी क्रम में पुराने अनारकली क्षेत्र, जैन मंदिर से लोहरी गेट तक के हिस्सों और वॉल्ड सिटी के ऐतिहासिक मार्गों के पुनरुद्धार का काम भी तेज किया गया है। सड़कों को पैदल यात्रियों के अनुकूल बनाया जा रहा है, पुराने बाज़ारों की दृश्य पहचान लौटाने की कोशिश हो रही है और ऐतिहासिक स्थापत्य को संरक्षित किया जा रहा है।

भारतीय मीडिया में इस खबर को साझा विरासत और विभाजन पूर्व इतिहास की वापसी के रूप में देखा गया। कुछ रिपोर्टों में यह भी उल्लेख आया कि पाकिस्तान में अब भगत सिंह जैसी हस्तियों की स्मृति को लेकर भी नए सिरे से विमर्श हो रहा है। हाल ही में लाहौर में भगत सिंह की शहादत दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों को भी इसी सांस्कृतिक पुनर्स्मरण से जोड़कर देखा गया।

हालांकि पाकिस्तान के भीतर इस पहल पर बहस भी शुरू हो गई है। सोशल मीडिया और रेडिट जैसे मंचों पर कुछ लोगों ने इसे इतिहास से जुड़ने की सकारात्मक कोशिश कहा, जबकि कुछ ने सवाल उठाया कि क्या इससे पुराने राजनीतिक विवाद भी लौट आएंगे। कुछ प्रतिक्रियाओं में यह भी कहा गया कि कई पुराने नाम जनता की स्मृति में आज भी जीवित हैं, भले ही सरकारी रिकॉर्ड बदल गए हों।

दरअसल, यह पूरी बहस केवल लाहौर तक सीमित नहीं है। दक्षिण एशिया में शहरों और सड़कों के नाम हमेशा राजनीति, पहचान और इतिहास की लड़ाई का हिस्सा रहे हैं। भारत में इलाहाबाद से प्रयागराज और मुगलसराय से दीनदयाल उपाध्याय नगर जैसे बदलाव हुए, तो पाकिस्तान में भी विभाजन के बाद कई हिंदू-सिख नाम बदले गए थे। अब लाहौर में पुराने नामों की वापसी को कई लोग इतिहास के साथ समझौते की नहीं, बल्कि दोबारा संवाद की शुरुआत मान रहे हैं।

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