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अड्डा Analysis इधर योगी उधर कोविड, HC: सीएम बनते ही धामी के लिए कांवड़ यात्रा बनी पहली कठिन परीक्षा, आज प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह से की वार्ता, निकलेगा रास्ता!

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कांवड़ यात्रा का मसला पहुंचा दिल्ली दरबार

दिल्ली/देहरादून: सावन की कांवड़ यात्रा पर फैसला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए कठिन परीक्षा बन चुका है। हालात मुख्यमंत्री से न संभलते अब मामला दिल्ली दरबार तक पहुंच चुका है। खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात में ये मुद्दा उठाया। पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह से मुलाकात के बाद जारी राज्य सरकार की दोनों विज्ञप्तियों में बाक़ायदा इसका ज़िक्र किया गया है कि मुख्यमंत्री ने चारधाम और कांवड़ यात्रा पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से चर्चा की है। ये बताता है कि एक तरफ यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ का कांवड़ यात्रा की हिमायत करना और दूसरी तरफ उत्तराखंड के जमीनी हालात इसके ठीक विपरीत होने से मुख्यमंत्री धामी फंस गए हैं।


यूपी सरकार कांवड़ियों के लिए रेड कारपेट बिछा रही और उत्तराखंड के हालात की एक बानगी मसूरी के कैम्पटी फ़ॉल की वायरल तस्वीरें और उसके बाद नैनीताल-मसूरी में लगते जाम से दिख जा रही है। रही-सही कसर वीकैंड पर हरिद्वार में हरकी पैड़ी पर जुटती भीड़ पूरी कर दे रही।इन सबसे ऊपर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को लिखित में बताया है कि कांवड़ यात्रा पर पिछली साल की तरह इस साल भी रोक लगा दी गई है। राज्य सरकार ने 30 जून को कांवड़ यात्रा रोक का निर्णय लिया था और एक जुलाई को इसका शासनादेश भी जारी कर दिया था। लेकिन चार जुलाई को सीएम बदले गए और उसके बाद यूपी सीएम योगी का फोन आने ले पुष्कर सिंह धामी संकट मे फंस गए हैं।

कहने को बैठक कर ली और बयान भी दे दिया कि कांवड़ संचालन पर पड़ोसी राज्यों से वार्ता करेंगे। लेकिन पड़ोसी राज्यों में यूपी तो खुलकर कह रहा कि यूपी से आने वाले कांवड़ियों को गंगाजल लेने आने से न रोका जाए। अब भले पड़ोसी राज्यों से सलाह-मशविरे के नाम पर गेंद उधर सरकाई गई हो लेकिन असल में गेंद अभी भी सीएम धामी के पाले में ही है। इसीलिए धामी ने शीर्ष नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुँचा दी है। देखना होगा दिल्ली से लौटकर मुख्यमंत्री इस पर क्या स्टैंड लेते हैं।


वैसे अकेले कठिन परीक्षा कांवड़ यात्रा ही नहीं ठहरी बल्कि त्रिवेंद्र राज के तथाकथित ऐतिहासिक कदम देवस्थानम बोर्ड का मसला भी तीरथ राज के 115 दिनों में लटका ही रह गया। अब तीर्थ पुरोहितों के आंदोलन को एक महीना बीत चुका है यानी सीएम धामी को देवस्थानम बोर्ड को लेकर भी सरकार का स्टैंड स्पष्ट करना होगा। आखिर त्रिवेंद्र और तीरथ के निपटने के पीछे कुछ लोग कुंभ और देवस्थानम बोर्ड पर संतों, तीर्थ-पुरोहितों की नाराजगी को भी एक वजह करार देते हैं।

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