
- हरीश रावत के ‘रिटायरमेंट’ पर फिर सियासी चर्चा, बोले- ‘चितकबरे चहेतों’ ने संन्यास की सुपारी ले रखी
Adda Politics: उत्तराखंड की सियासत में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के राजनीतिक रिटायरमेंट को लेकर समय-समय पर उठती चर्चाओं ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों दिल्ली में प्रवास कर रहे रावत ने अब सोशल मीडिया के जरिए उन लोगों पर अपने अंदाज में तंज कसा है, जो उन्हें सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दे रहे हैं।

अब तक ‘उज्याडू बल्द’ के ज़रिए कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए एक जमाने के अपने राजनीतिक साथियों पर निशाना साधते आए हरदा ने इस बार फेसबुक पोस्ट में एक नई राजनीतिक संज्ञा ‘चितकबरे चहेते’ ईजाद करते हुए ऐसे लोगों को आड़े हाथों लिया है। रावत ने कहा कि उनके कुछ चितकबरे चहेतों ने उन्हें सक्रिय राजनीति से संन्यास दिलाने की ‘सुपारी’ ले रखी है।
हालांकि हरदा ने यह भी साफ किया कि वह संन्यास को जीवन की उच्चतम स्थिति मानते हैं और भविष्य में उस अवस्था में जाने के इच्छुक भी हैं, लेकिन फिलहाल सक्रिय राजनीति से हटने का उनका कोई ऐलान नहीं है।
‘जिस दिन संन्यास लूंगा, पूरे गाजे-बाजे के साथ करूंगा’
हरीश रावत ने अपने पोस्ट में लिखा कि जिस दिन कांग्रेस नेतृत्व या देहरादून में उनके सहयोगी उनसे सक्रिय राजनीति से संन्यास की अपेक्षा करेंगे, वह उस सलाह के लिए उन्हें ससम्मान धन्यवाद देंगे और उसे सार्वजनिक रूप से साझा भी करेंगे।
रावत ने अपने करीब 60–62 वर्षों के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि इतने लंबे राजनीतिक सफर से संन्यास कोई छुप-छुपाकर लेने वाली बात नहीं होगी। उनके शब्दों में, जिस दिन संन्यास घोषित करेंगे, पूरे गाजे-बाजे के साथ करेंगे।
उन्होंने कहा कि उस मौके पर वह उत्तराखंड के लोगों और राजनीतिक जीवन में उनका साथ देने वाले कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करेंगे और जीवन के शेष समय के लिए अपना नया रोडमैप भी घोषित करेंगे।
कांग्रेस की हारों की ‘गठरी’ भी मेरे सिर पर?
हरदा का सियासी तंज यहीं नहीं रुका। उन्होंने कहा कि दूसरी पार्टी के सक्रिय और अर्ध-सक्रिय शुभचिंतक भी उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दे चुके हैं।
इसके साथ ही उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा, जो उनके मुताबिक उन्हें संन्यास भी दिलाना चाहते हैं और साथ-साथ कांग्रेस की तमाम चुनावी हारों की ‘गठरी’ उनके सिर पर रखना चाहते हैं।
रावत ने अपनी राजनीतिक यात्रा का अध्ययन करने वालों का व्यंग्यात्मक अंदाज में धन्यवाद भी दिया और माना कि उन्होंने जितने चुनाव जीते हैं, उससे अधिक चुनाव हारे हैं। लेकिन इसके साथ उन्होंने अपनी राजनीतिक शैली की एक और तस्वीर पेश की।
‘हर हार के बाद जीत के संकल्प के साथ खड़ा हुआ’
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हर हार के बाद वह जीत के नए संकल्प के साथ खड़े हुए, आगे बढ़े और आज भी जीत के संकल्प के साथ डटे हुए हैं।
रावत ने लिखा कि हार और जीत जनता-जनार्दन के हाथ में है और प्रारब्ध में जो लिखा होगा, वही होगा। लेकिन उनके मुताबिक प्रारब्ध को बदलने की कोशिश करना, उसके लिए संघर्ष करना और प्रार्थना करना ही हरीश रावत की खासियत है।
‘मोहनरी के छोटे से गांव से राष्ट्रीय फलक तक…’
अपने राजनीतिक सफर का उल्लेख करते हुए रावत ने कहा कि मोहनरी के छोटे से गांव से लेकर राष्ट्रीय फलक तक की उनकी यात्रा का यही मर्म है और उन्हें अपनी इस यात्रा पर गर्व है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनकी राजनीतिक यात्रा के दौरान उन्होंने कुछ लोगों को ‘चिड़कौवा’ बना दिया और कई लोगों को राजनीतिक नुकसान भी महसूस हुआ होगा। लेकिन उनका दावा है कि जो भी उनके पास आया, उन्होंने सदैव उसकी मदद की और आज भी लोगों की हरसंभव मदद के लिए तत्पर हैं।
रावत का संदेश साफ: अभी ‘संन्यास’ नहीं!
हरीश रावत की इस फेसबुक पोस्ट को उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही अटकलों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। पोस्ट में उन्होंने संन्यास की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, लेकिन साथ ही यह संकेत जरूर दिया है कि फिलहाल सक्रिय राजनीति से विदाई की कोई घोषणा नहीं होने जा रही।
हरदा के अंदाज में कहें तो-‘संन्यास होगा तो गाजे-बाजे के साथ होगा।’ फिलहाल उनके ‘चितकबरे चहेतों’ को इंतजार करना पड़ेगा।

ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे कुछ #चितकबरे चहेतों ने मुझसे सक्रिय राजनीति से संन्यास दिलवाने की ‘सुपारी’ ले रखी है। वैसे मैं संन्यास को जीवन की उच्चतम् स्थिति मानता हूँ और मैं भविष्य में उस अवस्था में जाने का अभिलाषी भी हूँ। मगर हाल-फिलहाल मैं उन्हें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जिस दिन पार्टी का नेतृत्व या देहरादून के मेरे सहयोगी मुझसे सक्रिय राजनीति से संन्यास की अपेक्षा करेंगे, मैं उन्हें ससम्मान धन्यवाद देते हुए उस सलाह को सबके साथ साझा करूँगा।
लगभग 60–62 वर्षों के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन से संन्यास कोई छुप-छुपाकर तो नहीं होगा न ? जिस दिन संन्यास घोषित करूँगा, पूरे गाजे-बाजे के साथ करूँगा। उत्तराखंड के सभी भाई-बहनों और सक्रियतापूर्वक राजनीतिक जीवन में मेरा साथ देने के लिए कार्यकर्ता साथियों को धन्यवाद दूंगा और खुशी-खुशी जीवन के शेष बचे हुए दोनों के लिए अपना नया रोड मैप भी घोषित करूँगा।
यूं बताते चलूं कि कुछ दूसरी पार्टी के सक्रिय और अर्ध सक्रिय शुभचिंतकों ने भी मुझे राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी है। मेरे ये चितकबरे चहेते मुझे संन्यास भी दिलवाना चाहते हैं और साथ-साथ कांग्रेस की समस्त चुनावी हारों का, चाहे उत्तराखंड की हो या कहीं और राज्य की हो, उनकी गठरी भी मेरे सर पर रखना चाहते हैं।
उन्होंने मेरी राजनीतिक यात्रा का गंभीरता से गहन अध्ययन किया है, उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं और यह सत्यता है कि मैं जितने चुनाव जीता हूं, उससे अधिक चुनाव हारा हूँ। मगर यह भी सत्यता है कि हर हार के बाद मैं जीत के नए संकल्प के साथ खड़ा हुआ हूँ, आगे बड़ा हूं और आज भी जीत के संकल्प के साथ डटा हुआ हूँ।
हार और जीत जनता-जनार्दन के हाथ में है। जो प्रारब्ध में लिखा होगा, वही होगा। लेकिन प्रारब्ध के लिखे को बदलने की कोशिश करना, उसके लिए संघर्ष और प्रार्थना करना ही हरीश रावत की खासियत है। मोहनरी के छोटे से गाँव से लेकर राष्ट्रीय फलक तक की मेरी राजनीतिक यात्रा का यही मर्म भी है और मुझे अपनी इस यात्रा पर गर्व है। मैंने इस राजनीतिक में कुछ लोगों को अवश्य चिड़कौवा बना दिया है, कइयों को राजनीतिक नुकसान भी महसूस हुआ होगा, पर सच्चाई यह भी है कि जो भी मेरे पास आया, मैंने सदैव उसकी मदद की और आज भी मैं लोगों की हर संभव मदद के लिए तत्पर रहता हूँ।
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