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चुनावी साल में मातृशक्ति पर सौगातों की बारिश: यूपी-उत्तराखंड में 60+ महिलाओं को फ्री बस यात्रा, पिंक ई-बस और ₹2.50 लाख लोन

धामी सरकार की इस घोषणा का प्रदेश की साढ़े 6 लाख महिलाओं को लाभ मिलेगा। रक्षाबंधन के मौके पर उत्तराखंड में मुफ्त बस यात्रा के साथ 10 पिंक ई-बसें, महिला स्वरोजगार योजना में रियायती ऋण की सीमा बढ़ाकर 2.50 लाख रुपये करने और प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर हाईटेक टॉयलेट बनाने जैसी घोषणाएं की गई हैं।

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UP-Uttarakhand Women Schemes: चुनावी साल में महिला मतदाताओं को साधने की कवायद तेज होती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं के लिए रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की योजना लागू होने के बाद रक्षाबंधन के मौके पर उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 60 वर्ष की आयु से महिलाओं को रोडवेज बसों में निशुल्क सफर की घोषणा कर दी। धामी सरकार की इस घोषणा का प्रदेश की साढ़े 6 लाख महिलाओं को लाभ मिलेगा। रक्षाबंधन के मौके पर उत्तराखंड में मुफ्त बस यात्रा के साथ 10 पिंक ई-बसें, महिला स्वरोजगार योजना में रियायती ऋण की सीमा बढ़ाकर 2.50 लाख रुपये करने और प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर हाईटेक टॉयलेट बनाने जैसी घोषणाएं की गई हैं।

दोनों राज्यों में घोषणाओं की टाइमिंग ने महिला मतदाताओं को लेकर चुनावी राजनीति को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यूपी में ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना’ के तहत 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई है। योजना को आजीवन मुफ्त यात्रा के रूप में मंजूरी दी गई है।

यूपी में पहले चला 60+ महिलाओं के मुफ्त सफर का दांवउत्तर प्रदेश सरकार के फैसले के मुताबिक 60 वर्ष एवं उससे अधिक आयु की महिलाएं राज्य परिवहन निगम की साधारण बसों में मुफ्त यात्रा कर सकेंगी। सरकारी अनुमान के अनुसार इस सुविधा से प्रतिदिन करीब 88 हजार से अधिक महिला यात्रियों को लाभ मिलने की उम्मीद है और इसका अनुमानित वित्तीय भार करीब 22.55 करोड़ रुपये प्रतिमाह बताया गया है।

योजना के लिए पात्र महिलाओं को विशेष स्मार्ट कार्ड उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई है। खास बात यह है कि इस सुविधा के लिए आय सीमा की बाध्यता नहीं रखी गई है।

यूपी के बाद उत्तराखंड में भी 60 की उम्र से फ्री रोडवेज सफर

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रक्षाबंधन के मौके पर घोषणा की कि वर्तमान में 65 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली रोडवेज की मुफ्त यात्रा सुविधा अब महिलाओं के लिए 60 वर्ष की आयु से लागू की जाएगी। सरकार का तर्क है कि इससे बुजुर्ग महिलाओं को सुरक्षित और सुगम आवागमन की सुविधा मिलेगी। स्वाभाविक है कि पहाड़ से लेकर मैदान तक सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर महिलाओं के लिए यह घोषणा खास महत्व रखती है। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में जहां नियमित और सस्ता सार्वजनिक परिवहन महिलाओं की रोजमर्रा की आवाजाही का अहम हिस्सा है।

10 पिंक ई-बसें महिलाओं के नाम

मुफ्त यात्रा के साथ उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने महिला यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए पिंक ई-बसों की भी घोषणा की है। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा के तहत उत्तराखंड को मिलने वाली 137 इलेक्ट्रिक बसों में से देहरादून में संचालित होने वाली 100 बसों में 10 बसें महिलाओं के लिए पिंक ई-बस के रूप में समर्पित की जाएंगी। सरकार ने इसे चरणबद्ध तरीके से प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों तक विस्तार देने की बात कही है। यानी महिला केंद्रित पैकेज में एक तरफ बुजुर्ग महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा है तो दूसरी तरफ शहरी महिलाओं के लिए सुरक्षित और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन का विकल्प तैयार करने की कोशिश है।

महिला स्वरोजगार ऋण अब ढाई लाख तक

महिला सशक्तिकरण का दूसरा बड़ा मोर्चा आर्थिक आत्मनिर्भरता है। उत्तराखंड में महिला स्वरोजगार योजना के तहत रियायती बैंक ऋण की सीमा 2 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.50 लाख रुपये करने की घोषणा की गई है। मुख्यमंत्री ने महिलाओं को केवल रोजगार तलाशने वाली नहीं बल्कि रोजगार देने वाली शक्ति बनाने की बात कही है। सरकार के मुताबिक स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक ब्याजमुक्त ऋण देने का प्रावधान भी है।

3.09 लाख ‘लखपति दीदी’, अब करोड़पति बनने का लक्ष्य

सरकार के अनुसार उत्तराखंड में 3 लाख 9 हजार महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। अब सरकार महिलाओं को लखपति दीदी से आगे बढ़कर उद्यम और कारोबार के जरिए आय बढ़ाने का लक्ष्य दे रही है।

महिला उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव योजना के तहत विकासखंड स्तर पर केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। देहरादून में प्रदेश के सभी 13 जिलों के उत्पादों की बिक्री के लिए 13 सेंटर स्थापित करने की योजना भी बताई गई है।

हाईटेक टॉयलेट से सुरक्षा, सुविधा और सम्मान का एजेंडा

महिला केंद्रित घोषणाओं का एक और अहम हिस्सा सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ा है। उत्तराखंड के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों, बाजारों और पर्यटन स्थलों पर महिलाओं के लिए आधुनिक हाईटेक टॉयलेट विकसित किए जाने की घोषणा की गई है। सरकार के मुताबिक इन सुविधाओं में स्वच्छता के साथ महिलाओं की निजता, सुरक्षा और जरूरी सुविधाओं का ध्यान रखा जाएगा। इस तरह सरकार महिला एजेंडे को सिर्फ रोजगार या सरकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय परिवहन, सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़कर पेश कर रही है।

नौकरी के आरक्षण से लेकर मुफ्त सफर तक

 

मुख्यमंत्री धामी ने महिला सशक्तिकरण से जुड़ी अन्य योजनाओं का भी उल्लेख किया। इनमें सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, नंदा गौरा योजना, मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट, 181 महिला हेल्पलाइन और वन स्टॉप सेंटर जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। सरकार का संदेश है कि महिलाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि नेतृत्व और आर्थिक गतिविधियों की भागीदार बनाया जाए।

वैसे सवाल सिर्फ आधी आबादी के कल्याण का नहीं, ‘महिला वोट का भी है और यही इन घोषणाओं का राजनीतिक पहलू भी उजागर करता है। आखिर चंद महीनों बाद दोनों राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं और भाजपा यूपी-उत्तराखंड में जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रही है। लिहाजा आधी आबादी को लुभाने के लिए सीएम योगी और धामी ने बैटिंग शुरू कर दी है।

इसी कड़ी में यूपी में 60+ महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और उसके बाद उत्तराखंड में लगभग उसी उम्र सीमा पर मुफ्त रोडवेज सफर की घोषणा—दोनों फैसले अपने-अपने स्तर पर कल्याणकारी योजनाएं हैं, लेकिन चुनावी समय में इनकी टाइमिंग साफ इशारा करती है कि लक्ष्य 2027 का विधानसभा चुनाव है।
मोदी राज में चुनाव दर चुनाव महिला मतदाताओं की भूमिका निर्णायक साबित हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा हो या राज्यों के विधानसभा चुनाव, महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए कोर कसर नहीं छोड़ते हैं और राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर नतीजों में उभरे पैटर्न बताते हैं कि महिला मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की जीत में निर्णायक भूमिका निभाता है।
संख्या के लिहाज से भी देश में महिला वोटर किसी भी दल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2024 लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या 47.63 करोड़ से अधिक थी और कुल मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी 48.62 प्रतिशत रही। 2019 में यह हिस्सेदारी 48.09 प्रतिशत थी।

राजनीतिक अध्ययन भी बताते हैं कि महिला मतदाता अब परिवार के पुरुष सदस्यों के मतदान निर्णय का महज अनुसरण करने वाला समूह नहीं रह गई हैं। महिला मतदान की बढ़ती भागीदारी और स्वतंत्र राजनीतिक प्राथमिकताओं पर लगातार अध्ययन हो रहे हैं। (‘रेवड़ी’ या ‘वेलफेयर पॉलिटिक्स’?

असली सवाल यही है कि चुनावी बेला में आधी आबादी को लक्षित कर होने वाली घोषणाएं चुनावी रेवड़ी मानी जाएं या फिर इसे वेलफेयर पॉलिटिक्स समझा जाए? स्वाभाविक है कि इस तरह की तमाम लुभावनी योजनाओं और घोषणाओं को सरकारें जहाँ महिला सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मान से जोड़कर पेश करेंगी, तो वहीं विपक्ष इन्हें चुनावी लाभ के लिए दी जा रही रेवड़ियां करार दे रहा है।
एक बयान में यूपी में समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने बुजुर्ग महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा योजना को चुनाव से पहले मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया है।यानी आने वाले महीनों में सवाल यह नहीं होगा कि महिलाओं के लिए और घोषणाएं होंगी या नहीं, बल्कि यह होगा कि इन योजनाओं का राजनीतिक असर कितना दिखाई देता है।यूपी से उत्तराखंड तक एक जैसा संदेशयूपी में ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना’ और उत्तराखंड में 60 वर्ष से महिलाओं के लिए मुफ्त रोडवेज यात्रा- दोनों घोषणाएं एक बड़ा राजनीतिक संदेश देती हैं। महिला मतदाता अब सिर्फ ‘लाभार्थी’ नहीं हैं। वे चुनावी राजनीति में एक ऐसा स्वतंत्र और बड़ा मतदाता समूह बन चुकी हैं, जिसे साधने के लिए मुफ्त यात्रा से लेकर रोजगार, ऋण, सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं तक का पूरा पैकेज तैयार किया जा रहा है।

उत्तराखंड में धामी सरकार की रक्षाबंधन घोषणाएं इसी बड़े ‘महिला वोट’ नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देती हैं। अब देखना होगा कि विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते ‘मातृशक्ति’ के नाम पर सौगातों की यह सूची कितनी लंबी होती है और महिला मतदाता इसे सिर्फ सुविधा के तौर पर देखती हैं या चुनावी फैसला सुनाने के औजार के रूप में भी इस्तेमाल करती हैं।

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