
देहरादून | 22 अगस्त 2026 ।
उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ ग्लेशियरों, जंगलों और पहाड़ों तक सीमित पर्यावरणीय चिंता नहीं रह गया है। यह समुदायों, विकास मॉडल, बुनियादी ढांचे और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से भी सीधे जुड़ता जा रहा है। वर्ष 2025 में सामने आई 98 प्रमुख जलवायु आपदाओं के विश्लेषण ने राज्य के लिए ऐसे पांच गंभीर रेड फ्लैग सामने रखे हैं, जो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की आपदा और विकास नीति के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
एसडीसी फाउंडेशन और मेसर्स बिशेन सिंह महेंद्र पाल सिंह की ओर से प्रकाशित ‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण में यह विश्लेषण सामने आया है। पुस्तक का शनिवार को देहरादून स्थित दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में लोकार्पण किया गया। इस संस्करण की थीम ‘कम्युनिटीज एंड कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स इन द टाइम्स ऑफ क्लाइमेट क्राइसिस’ है।
2025 में 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स का विश्लेषण
पुस्तक में जनवरी से दिसंबर 2025 तक उत्तराखंड में सामने आई 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स से जुड़ी न्यूज रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया गया है। यह सामग्री उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव के तहत तैयार की गई 12 मंथली रिपोर्ट्स पर आधारित है।
विश्लेषण से राज्य में बार-बार सामने आ रहे पांच प्रमुख पैटर्न को ‘रेड फ्लैग’ के तौर पर चिन्हित किया गया है।
उत्तराखंड के लिए सामने आए पांच बड़े रेड फ्लैग
1. प्रशासनिक देरी और जवाबदेही का संकट
डिजास्टर प्रिवेंशन में क्रॉनिक एडमिनिस्ट्रेटिव डिले, फ्रैगमेंटेड गवर्नेंस और अकाउंटेबिलिटी डेफिसिट को पहला बड़ा खतरा बताया गया है। इसका विश्लेषण मानव संसाधन विकास के पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने किया है।
2. शहरों में बढ़ता डिजास्टर रिस्क
दूसरा रेड फ्लैग उत्तराखंड के अर्बन और सेमी-अर्बन इलाकों में उभरते नए डिजास्टर लैंडस्केप्स को लेकर है। इस विषय पर अर्बन थिंकर और आर्किटेक्ट जगन शाह ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
3. ग्लेशियल लेक्स और क्रायोस्फियर में बदलाव
ग्लेशियल लेक्स, क्रायोस्फियर चेंज और ‘इल्यूजन ऑफ प्रिपेयर्डनेस’ को तीसरे बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है। इसका विश्लेषण वाडिया इंस्टीट्यूट के डॉ. मनीष मेहता ने किया है।
4. विकास परियोजनाओं से बढ़ता डिजास्टर रिस्क
इंफ्रास्ट्रक्चर-इंड्यूज्ड डिजास्टर रिस्क और क्राइसिस ऑफ मोबिलिटी को चौथे रेड फ्लैग के तौर पर रेखांकित किया गया है। इस विषय पर डॉ. लोकेश ओहरी ने लिखा है।
5. पर्यटन का बढ़ता पर्यावरणीय दबाव
फ्रेजाइल हिमालयी लैंडस्केप पर मास टूरिज्म के बढ़ते इकोलॉजिकल बर्डन को पांचवें गंभीर खतरे के रूप में सामने रखा गया है। इसका विश्लेषण एक्वाटेरा एडवेंचर्स के वैभव काला ने किया है।
क्लाइमेट क्राइसिस के साथ संविधान का सवाल भी
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें जलवायु संकट को केवल पर्यावरणीय या आपदा प्रबंधन के मुद्दे के रूप में नहीं देखा गया है। इसमें ‘थर्ड सी— कॉन्स्टिट्यूशन’ के जरिए उत्तराखंड के विकास से जुड़े कानूनी और संवैधानिक सवालों को भी विमर्श के केंद्र में लाया गया है।
यूपीईएस यूनिवर्सिटी के आदित्य रावत ने पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड में एनवायरनमेंटल लॉ और लेजिस्लेशन का विश्लेषण किया है। वहीं गौतम कुमार ने डिलिमिटेशन और राज्य में लगातार जारी माइग्रेशन की समस्या को उत्तराखंड के संदर्भ में देखा है।
प्रेरणा रतूड़ी ने एक हिल स्टेशन की स्थानीय निवासी के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर बदलते पहाड़ी जीवन और इससे जुड़ी चुनौतियों को सामने रखा है।
‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ का तीसरा संस्करण
यह पुस्तक श्रृंखला का तीसरा संस्करण है। एसडीसी फाउंडेशन ने इससे पहले वर्ष 2023 में ‘डिमिस्टिफाइंग डिजास्टर्स इन देवभूमि उत्तराखंड’ और वर्ष 2024 में ‘टेल्स ऑफ उत्तराखंड्स क्लाइमेट क्राइसिस एंड एन अनसर्टेन डेवलपमेंट मॉडल’ प्रकाशित की थीं।
2025 संस्करण की फोरवर्ड लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के पूर्व निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा ने लिखी है।
विशेषज्ञों ने कहा- डेवलपमेंट मॉडल पर नए सिरे से बहस जरूरी
लोकार्पण कार्यक्रम में पुस्तक की एडिटर प्रेरणा रतूड़ी ने पुस्तक का परिचय दिया। अनूप नौटियाल ने उत्तराखंड के डेवलपमेंट नैरेटिव में क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशनल कंसर्न्स को मेनस्ट्रीम करने की जरूरत पर जोर दिया।
पुस्तक के कॉन्ट्रिब्यूटर्स डॉ. मनीष मेहता, डॉ. लोकेश ओहरी और गौतम कुमार ने अपने-अपने लेखों में उठाए गए प्रमुख मुद्दों पर विचार साझा किए।
कार्यक्रम का स्वागत संबोधन दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के चंद्रशेखर तिवारी ने किया, जबकि संचालन एसडीसी फाउंडेशन के दिनेश सेमवाल ने किया। अभिमन्यु गहलोत ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम में स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी, श्री गुरु राम राय यूनिवर्सिटी, सरदार भगवान सिंह यूनिवर्सिटी, क्वांटम यूनिवर्सिटी, दून बिजनेस स्कूल, तुलाज़ यूनिवर्सिटी, उत्तरांचल यूनिवर्सिटी, डीआईटी यूनिवर्सिटी और दून यूनिवर्सिटी के बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स और फैकल्टी मेंबर्स शामिल हुए।
इस मौके पर सिविल सोसायटी, अकादमिक और रिसर्च क्षेत्र से जुड़े कई लोग भी मौजूद रहे।
उत्तराखंड के भविष्य पर संवाद की जरूरत
एडिटर्स ने कहा कि क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशन के बीच संबंधों पर उत्तराखंड में व्यापक संवाद की जरूरत है। उन्होंने एक्सपर्ट्स, सिविल सोसायटी, रिसर्चर्स और युवाओं से आगे आकर अपने विचार साझा करने और राज्य के लिए अधिक सस्टेनेबल और अकाउंटेबल भविष्य की दिशा तय करने में योगदान देने का आह्वान किया।
मुख्य तथ्य एक नजर में
* 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स का विश्लेषण
* जनवरी-दिसंबर 2025 की घटनाओं पर आधारित अध्ययन
* 12 मंथली रिपोर्ट्स के आधार पर विश्लेषण
* उत्तराखंड के लिए 5 प्रमुख रेड फ्लैग
* क्लाइमेट चेंज के साथ कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स पर फोकस
* ‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ सीरीज का तीसरा संस्करण
- उत्तराखंड में 2025 में 98 बड़ी जलवायु आपदाएं, रिपोर्ट ने बताए 5 गंभीर रेड फ्लैग



