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अखिलेश का ‘चवन्नी’ तंज, जयंत की ‘स्वाभिमान’ रैली: क्या 2027 में फिर किंगमेकर बनेगी RLD?

‘चवन्नी’ से ‘स्वाभिमान’ तक: क्या अखिलेश के तंज ने RLD को दे दिया खोई जमीन वापस पाने का मौका?

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  • अखिलेश यादव के बयान पर जयंत चौधरी का पलटवार, 3 सितंबर को सहारनपुर में ‘स्वाभिमान’ के नाम पर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी; सवाल-क्या 2027 में फिर पश्चिमी यूपी की सियासत की धुरी बनेगी RLD?
  • Akhilesh Yadav vs Jayant Chaudhary: क्या 2027 में RLD बनेगी किंगमेकर?
  • आरएलडी की छवि बनी- हर चुनाव में नए दल के साथ गठबंधन, क्या 2027 में यह फिर दोहराया जाएगा ? 

Akhilesh vs Jayant: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर पश्चिमी यूपी का जाटलैंड चर्चा के केंद्र में है। वजह है समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी पर ‘चवन्नी’ वाला तंज और उसके बाद शुरू हुई सियासी जुबानी जंग। जयंत चौधरी ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर अखिलेश यादव को इतने सस्ते शब्दों का इस्तेमाल ही करना था तो उनका नाम लेकर बात करते। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है और वही किसी को बनाती और बिगाड़ती है।

अब इस विवाद को आरएलडी ने महज एक बयान का जवाब देने तक सीमित रखने के बजाय राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। 3 सितंबर को सहारनपुर के रामपुर मनिहारान में जयंत चौधरी का अभिनंदन कार्यक्रम प्रस्तावित है, जिसे आरएलडी कार्यकर्ता ‘स्वाभिमान रैली’ के तौर पर देख रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और बिजनौर सांसद चंदन चौहान ने कार्यक्रम की जानकारी दी है।

बड़ा सवाल है कि क्या अखिलेश यादव का हमला अनजाने में आरएलडी को वह राजनीतिक मुद्दा दे गया है, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी?

‘चवन्नी’ पर सियासत क्यों गरमाई?

अखिलेश यादव का तंज मूलतः जयंत चौधरी की राजनीतिक यात्रा और उनके भाजपा के साथ जाने को निशाना बनाने वाला माना गया। इसके बाद आरएलडी ने इसे व्यक्तिगत टिप्पणी के बजाय राजनीतिक और सामाजिक सम्मान से जोड़ना शुरू कर दिया। जयंत चौधरी ने भी जवाब में सीधे टकराव का रास्ता अपनाया है और इसे खुद नहीं बल्कि जाट समाज पर टिप्पणी का मामला बनाने की कोशिश में जुटे हैं। मामला यहीं नहीं रुका। मायावती ने भी अखिलेश यादव से जाट समाज से तुरंत माफी मांगने की मांग करके सियासी तपिश को और भड़का दिया है। इस तरह जो विवाद दो नेताओं के बीच था, वह धीरे-धीरे ‘जयंत बनाम अखिलेश’ से ‘जाट सम्मान बनाम सपा’ के नैरेटिव की तरफ बढ़ने लगा है।

कभी पश्चिमी यूपी की राजनीति की धुरी रही RLD करेगी वापसी?

दरअसल, राष्ट्रीय लोकदल की कहानी समझे बिना मौजूदा विवाद की राजनीतिक अहमियत समझना मुश्किल है। आरएलडी की जड़ें पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति में हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश लंबे समय तक इस राजनीतिक विरासत का सबसे मजबूत आधार रहा।

चौधरी चरण सिंह के बाद उनके बेटे चौधरी अजित सिंह ने इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। इसी राजनीतिक विरासत के बूते  बागपत लंबे समय तक चौधरी परिवार का गढ़ बना रहा। 1999 से 2009 तक अजित सिंह ने आरएलडी के टिकट पर लगातार बागपत लोकसभा सीट जीती। यह अलग बात है कि उनके रहते हुए आरएलडी का राजनीतिक जनाधार सिकुड़ता चला गया। कुछ राजनीतिक जानकार इसके पीछे ‘छोटे चौधरी’ द्वारा बार-बार गठबंधन बदलते रहने को भी मानते हैं।

एक दौर में आरएलडी का सबसे बड़ा राजनीतिक आधार सिर्फ जाट वोट नहीं था। लंबे समय तक जाट-मुस्लिम सामाजिक समीकरण या यूं कहिए कि अधिसंख्य कास्तकर तबके को अपने पाले में लामबंद करके चौधरी परिवार पश्चिमी यूपी में बड़ी ताकत बना रहा। लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने इस समीकरण को गहरी चोट पहुंचाई। जाट और मुसलमान का यह सामाजिक समीकरण दरक गया और इसी के साथ आरएलडी का जनाधार भी सिकुड़ गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह और जयंत चौधरी दोनों को हार का सामना करना पड़ा।

यही वह दौर था जब पश्चिमी यूपी में भाजपा का प्रभाव तेजी से बढ़ा और आरएलडी का राजनीतिक आधार सिकुड़ता चला गया। जबकि पश्चिमी यूपी में बसपा और सपा की सियासी ज़मीन भी कायम रही।

2014 से 2019: RLD का सबसे बुरा दौर

2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी अपने सभी आठ प्रत्याशित क्षेत्रों में हार गई। 2019 में भी एसपी-बीएसपी गठबंधन का हिस्सा बनने के बावजूद आरएलडी तीनों लोकसभा सीटें हार गई। इनमें बागपत से जयंत चौधरी और मुजफ्फरनगर से अजित सिंह भी शामिल थे।

हालांकि 2018 के कैराना उपचुनाव ने एक संकेत जरूर दिया था कि अगर जाट, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक समूहों का नया समीकरण बनता है तो आरएलडी फिर मुकाबले में आ सकती है। आरएलडी की तबस्सुम हसन की जीत ने पश्चिमी यूपी में विपक्षी सामाजिक गठजोड़ की संभावनाओं को फिर चर्चा में ला दिया था। लेकिन लोकसभा स्तर पर यह प्रयोग 2019 में सफल नहीं हो पाया।

2022 में जयंत ने दिखाई वापसी की झलक

इसके बाद जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाया और 2022 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी-सपा गठबंधन मैदान में उतरा। आरएलडी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं और करीब 2.85 प्रतिशत वोट हासिल किए। यह पार्टी के लिए 2017 की सिर्फ एक विधानसभा सीट की तुलना में स्पष्ट सुधार था।  यूपी के विधानसभा चुनाव 2022 ने साबित किया कि सही गठबंधन और सही सामाजिक समीकरण के साथ जयंत चौधरी पश्चिमी यूपी में अपनी पार्टी को फिर से खड़ा कर सकते हैं। लेकिन आरएलडी और जयंत की सियासी कहानी में एक बड़ा मोड़ 2024 में आया।

अखिलेश से भाजपा तक: जयंत का सबसे बड़ा राजनीतिक यू-टर्नजनवरी 2024 में आरएलडी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया था। आरएलडी को पश्चिमी यूपी की सात सीटें मिलने की बातचीत चल रही थी लेकिन फरवरी में जयंत चौधरी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में चले गए। भाजपा-आरएलडी समझौते में आरएलडी को बागपत और बिजनौर लोकसभा सीटें मिलीं और राज्यसभा सीट का भी आश्वासन दिया गया।

जयंत ने उस समय केंद्र सरकार द्वारा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने के फैसले के बाद भाजपा के साथ जाने को लेकर कहा था कि वह इस प्रस्ताव को कैसे ठुकरा सकते थे। इस फैसले ने आरएलडी को सत्ता के करीब जरूर पहुंचाया, लेकिन पार्टी के सामने एक नया सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या जयंत चौधरी भाजपा के साथ रहकर वही जाट-किसान राजनीति कर पाएंगे, जिसके दम पर चौधरी परिवार ने दशकों तक पश्चिमी यूपी में अपनी मजबूत पकड़ बनाई?

2024 में दो सीटें जीतीं, लेकिन जमीन कितनी मजबूत ?

2024 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने भाजपा के साथ गठबंधन में बागपत और बिजनौर, दोनों सीटें जीत लीं। बागपत में राजकुमार सांगवान और बिजनौर में चंदन चौहान विजयी हुए। तो क्या यह आरएलडी की पश्चिम में वापसी का महत्वपूर्ण संकेत माना जाए? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा के साथ मिलकर आरएलडी का लोकसभा की दो सीटें जीत लेना और पश्चिमी यूपी में दोबारा सियासत की ‘धुरी’ बन जाना- बिल्कुल दो अलहदा बातें हैं। आरएलडी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में चले किसान आंदोलन के बाद हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी के किसानों का एक बड़ा तबका मोदी सरकार से नाराज दिखा है। खासकर पश्चिमी यूपी में अपने परम्परागत वोटर के बीच जयंत चौधरी और उनकी पार्टी आरएलडी इस चुनौती से जूझ रहे हैं।

आरएलडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। भाजपा के साथ जाने के बाद जाट समाज का एक हिस्सा जयंत से नाराज हुआ था। 2024 के चुनाव के दौरान पश्चिमी यूपी में ऐसे जाट समूह भी सामने आए थे जो जयंत के भाजपा के साथ जाने से असहमत थे और मानते थे कि जाटों से जुड़े मुद्दे अभी भी कायम हैं। यही वजह है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रहने वाला है क्योंकि भाजपा के साथ संभावित गठबंधन में उन्हें सम्माजनक सीटें मिल पाती हैं या नहीं यह प्रश्न भी रहेगा और उससे कठिन यह कि ज़मीनी लड़ाई में जीत कितनी सीटों पर मिलती है।

कुल मिलाकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि भले जाट वोट पूरी तरह जयंत से बाहर नहीं गया, लेकिन यह भी मान लेना भी हकीकत से परे होगा कि पूरा जाट वोट अब भी आरएलडी के पक्ष में लामबंद है। यह भी ज़मीनी सच्चाई है कि आज पश्चिमी यूपी का जाट मतदाता सिर्फ चौधरी परिवार की राजनीतिक विरासत के आधार पर फैसला नहीं करता। खेती-किसानी के मुद्दे, अग्निवीर, गन्ना, बेरोजगारी, स्थानीय उम्मीदवार, मोदी-योगी सरकार का प्रदर्शन और सपा-कांग्रेस का सामाजिक समीकरण और चुनावी मूड-माहौल जैसे कई फैक्टर हैं जो बाक़ी वोटर्स की तरह जाट वोटर को भी प्रभावित करेंगे। उस पर आरएलडी की सबसे बड़ी चिंता यह भी होगी कि वह अतीत की तरह अपने परंपरागत चुनावी जीत के वोट बैंक का पुनः निर्माण कैसे करेगी जिसमें जाट वोटर के साथ मुस्लिम सुर अन्य किसान जातियां शामिल हुआ करती थीं।

‘स्वाभिमान रैली’ कितनी बड़ी परीक्षा?

3 सितंबर की सहारनपुर रैली इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे आरएलडी के लिए केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने के मौके के तौर पर देखा जा रहा है। अगर जयंत चौधरी इस मंच से ‘चवन्नी’ विवाद को सीधे जाट सम्मान से जोड़ने में सफल होते हैं और बड़ी संख्या में जाट, किसान तथा आरएलडी समर्थक जुटते हैं, तो पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि चौधरी परिवार की राजनीतिक जमीन अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन अगर रैली सिर्फ समर्थकों की भीड़ तक सीमित रहती है और उसका असर जाटलैंड के चुनावी समीकरण में दिखाई नहीं देता, तो इसे लखनऊ से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक प्रतिक्रियात्मक कार्यक्रम से ज्यादा महत्व मिलना मुश्किल होगा।

क्या RLD 2027 में किंगमेकर बन सकती है?

यही सबसे दिलचस्प सवाल है। आरएलडी के पास भाजपा जैसी राज्यव्यापी संगठनात्मक ताकत नहीं है और न ही वह समाजवादी पार्टी के पीडीए जैसी व्यापक सामाजिक पहुंच रखती है। लेकिन पश्चिमी यूपी में उसकी उपयोगिता उसकी सीटों की संख्या से कहीं ज्यादा हो सकती है। भाजपा के लिए आरएलडी का महत्व स्पष्ट है। 2024 में भाजपा ने पश्चिमी यूपी के जाट बहुल इलाकों में अपनी रणनीति को आरएलडी के साथ गठबंधन के जरिए मजबूत करने का प्रयास किया। भाजपा रणनीतिकारों की चिंता थी कि अगर जयंत चौधरी को नहीं साधा तो मुझे जाट वोटर विपक्षी धड़े के लिए जीत का आंकड़ा बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इसलिए आरएलडी को साथ लेकर भाजपा ने पश्चिम में विपक्ष की एकजुटता को ठीक चुनाव से पहले पंक्चर करने का दांव चला।

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में आरएलडी की ताकत तीन समीकरणों से पारखी जाएगी—

पहला समीकरण- जाट वोटर्स का कितना हिस्सा जयंत के साथ रहता है।

दूसरा- क्या आरएलडी जाट वोटबैंक से इतर किसान, गुर्जर, मुस्लिम और अन्य सामाजिक तबकों में भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ा पाती है।

तीसरा समीकरण- भाजपा और सपा के बीच मुकाबला कितना करीबी रहता है।

स्वाभाविक है कि तीसरी स्थिति सियासी लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर भाजपा और सपा के बीच मुकाबला बेहद कड़ा रहा और आरएलडी डेढ़-दो दर्जन सीटों पर जीत हासिल कर पाई, तो जयंत चौधरी की आरएलडी किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है। हालांकि अभी यूपी चुनाव में वक़्त है और चुनाव आने तक गंगा-यमुना में बहुत पानी बह जाएगा। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि आरएलडी की राजनीति का संकट रहा है कि वह कब कहां से यू-टर्न ले ले कहा नहीं जा सकता है।

आरएलडी के सियासी यू-टर्न और राजनीतिक विश्वसनीयता? 

2012 में कांग्रेस के साथ गठबंधन, 2014 में भाजपा के साथ, 2019 में सपा-बसपा के साथ गठबंधन और 2022 में सपा के साथ आने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा के साथ जाना बताता है कि आरएलडी की राजनीति में अगला यू-टर्न कब आ जाए किसी को पता नहीं चलता है। कुल मिलाकर बीते ढाई-तीन दशक का हाल देखेंगे तो आरएलडी ने लगभग हर चुनाव में नए दल के साथ गठबंधन किया और इस तरह से 25-30 सालों में पार्टी 10-12 दलों के साथ गठबंधन का अनुभव हासिल कर चुकी है। ऐसे में 2027 के चुनाव में आरएलडी के सामने यह प्रश्न फिर खड़ा होने वाला है। 

बहरहाल, अखिलेश यादव के जयंत चौधरी पर सियासी कटाक्ष करते हुए निकला ‘चवन्नी’ वाले बयान पर अभी बवाल थमता नहीं दिख रहा है। अलबत्ता आरएलडी की तीन सितंबर की रैली के दौरान जुटने वाली भीड़ और मंच पर जयंत चौधरी के तेवर इशारा करेंगे कि इस मुद्दे पर महाभारत कितनी लंबी चलेगी। अखिलेश बनाम जयंत जंग में कौन किस पर कितना भारी पड़ा और आरएलडी अपनी खोई सियासी ज़मीन वापस पाने में कितना कामयाब हुई इसकी मुकम्मल तस्वीर 2027 के नतीजों के बाद ही सामने आएगी। तब तक ‘चवन्नी’ सियासत का मज़ा लीजिए!

 

 

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