Adda स्पेशलPURE पॉलिटिक्सYour कॉलमन्यूज़ 360समाज

एक भरोसा, एक अनुशासन, निष्कलंक पहचान… विनम्र श्रद्धांजलि जनरल साहब …..

जनरल साहब केवल एक राजनेता नहीं थे, वे एक भरोसा थे… एक अनुशासन थे… और पहाड़ की सादगी व स्वाभिमान की जीवित पहचान थे।

Share now

अजेंद्र अजय। राजकीय इंटर कॉलेज, अगस्त्यमुनि में अध्ययनरत रहते हुए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संपर्क में आ गया था। इसी दौरान वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनावों की घोषणा हुई। भाजपा ने तत्कालीन बदरी-केदार विधानसभा क्षेत्र से स्व. श्री केदार सिंह फोनिया और गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी को अपना प्रत्याशी घोषित किया था। सेना के एक बड़े पूर्व अधिकारी के राजनीति में आने और गढ़वाल लोकसभा से चुनाव लड़ने का समाचार सबके लिए कौतूहल का विषय था। इसके साथ ही उनके बारे में यह जानकारी भी मिली कि वे दिग्गज नेता स्व. श्री हेमवती नंदन बहुगुणा के भांजे हैं, इसलिए उन्हें देखने की उत्सुकता भी थी।

चुनाव के दौरान अगस्त्यमुनि में उन्हें देखने और सुनने के लिए मैं उनकी जनसभा में पहुंचा था। उनका भाषण तो अब स्मृतियों में नहीं है, मगर इतना अवश्य याद है कि बिना किसी लाग-लपेट और औपचारिकता के सीधे-सपाट तरीके से अपनी बात रखने का उनका यह अंदाज शुरू से लेकर अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम समय तक बना रहा। इसके बाद जनरल साहब के साथ परिचय और निकटता कब हुई, इसका ठीक से मुझे स्मरण नहीं है।

इस बीच गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर में अध्ययनरत रहने के दौरान विद्यार्थी परिषद के कार्य के साथ मैंने समाचार पत्रों में लेखन कार्य भी शुरू कर दिया था। दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा के बाद मैं अमर उजाला के लिए नियमित रिपोर्टिंग करने लगा। तब जनरल साहब के साथ अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर आदि स्थानों पर पार्टी कार्यक्रमों और पत्रकार वार्ताओं में भी भेंट होने लगी थी।

मुझे वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव को निकट से देखने का अवसर मिला। उस समय पृथक राज्य आंदोलन के चलते आंदोलनकारी संगठनों ने “राज्य नहीं तो चुनाव नहीं” का नारा देकर चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया था। चुनाव के दौरान जनरल खंडूड़ी के चुनावी कार्यक्रमों में सुनियोजित तरीके से विघ्न पैदा किए गए। परिणामस्वरूप षड्यंत्र के चलते जनरल साहब चुनाव हार गए।

इसके बाद वर्ष 1998 और 1999 में लगातार लोकसभा चुनाव हुए। इन दोनों चुनावों में जनरल साहब ने मुझे अपने साथ रहने के लिए कहा। मैं चुनाव में उनके साथ मुख्यतः मीडिया का कार्य देखता था। तब गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र में चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी जनपदों के साथ देहरादून का शहरी क्षेत्र भी सम्मिलित था। पूरे क्षेत्र को 20-25 दिनों में कवर करना महाभारत से कम नहीं होता था। वह टाटा सूमो कारों का दौर था। दो टाटा सूमो के काफिले में जनरल साहब की कोशिश रहती थी कि बिना थके दिन-रात अधिक से अधिक क्षेत्र का दौरा किया जाए।

जनरल साहब ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिनके शब्दकोष में न तो लोकलुभावन शब्द थे और न ही लच्छेदार बातें। चुनाव के समय भी वे जो काम संभव नहीं होता था, उसके लिए सीधे “ना” कह देते थे। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती थी कि उनकी “ना” से सामने वाला व्यक्ति बुरा मान जाएगा। सही मायनों में उनकी इसी स्पष्टवादिता की जनता कायल भी थी। अनुचित बात पर वे पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को कड़ी डांट तक लगा देते थे। उनकी डांट निश्छल होती थी, इसलिए उनकी डांट का कभी किसी ने बुरा नहीं माना। उल्टा, डांट खाने वाला बड़े गौरव के साथ सबको बताता था कि — “यार, आज जनरल साहब ने मुझे डांट दिया।”

जनरल साहब बाहर से जितने कड़क थे, उनके हृदय में उतना ही नरम दिल इंसान भी बसता था। वे बाहर भले ही कुछ प्रकट न करें, मगर भीतर ही भीतर उनका प्रयास रहता था कि किसी जरूरतमंद की कैसे सहायता की जा सकती है। वे छोटे से छोटे व्यक्ति का भी ध्यान रखते थे। चुनाव प्रचार के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में कई स्थानों पर रात्रि विश्राम की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती थी। ऐसे स्थानों पर जनरल साहब अपने कक्ष में पहुंचकर मुझसे पूछते थे — मेरे सुरक्षाकर्मी और ड्राइवर के खाने और सोने की व्यवस्था हो गई? जब मैं हां में जवाब देता था, तब वे मजाक में कहते थे — तेरे खाने-रहने की व्यवस्था हो या न हो, मगर मेरे ड्राइवर और गनर की व्यवस्था हो जानी चाहिए।

उनकी यही मानवीय संवेदनाएं उन्हें सबसे अलग बनाती थीं।

जनरल साहब की सीधे-सपाट बोलने और कड़क मिजाज प्रशासक की छवि उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी थी। जनता को जनरल साहब की यह छवि बेहद पसंद थी। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में षड्यंत्र और वर्ष 2012 के कोटद्वार विधानसभा चुनाव में उनके प्रबंधकों की रणनीतिक कमियों के कारण हुई हार को यदि अपवाद मान लिया जाए, तो बाकी सभी चुनावों में जनता ने उन्हें भरपूर प्यार और समर्थन दिया।

मुझे स्मरण है कि लोकसभा चुनावों के दौरान पौड़ी जनपद के दूरस्थ क्षेत्रों में सुबह-सुबह की जनसभाओं में भी कई स्थानों पर दो-चार लोग शराब पीकर पहुंच जाते थे और सभा में विघ्न पैदा करने का प्रयास करते थे। मगर स्थानीय जनता स्वयं ही ऐसे लोगों को वहां से भगा देती थी। जनता समझ जाती थी कि यह सब जानबूझकर कराया जा रहा है। इससे जनता की जनरल साहब के प्रति सहानुभूति और भी बढ़ जाती थी।

लोकसभा चुनावों के दौरान जातिवाद का कार्ड खेलने का भी काफी प्रयास किया जाता था। मुझे याद है कि एक चुनाव में किसी कथित ब्राह्मण संगठन का लेटरहेड तैयार कर एक पत्र लिखा गया था। उस पत्र में राजपूत समाज के लोगों के प्रति घृणित विषवमन किया गया था। लेटरहेड ब्राह्मण संगठन का था, गालियां राजपूत समाज को दी गई थीं, और उस पत्र को चुन-चुनकर राजपूत नेताओं तथा जनप्रतिनिधियों को डाक के माध्यम से गांव-गांव भेजा गया था।

हालांकि, ऐसे किसी भी हथकंडे का जनरल साहब पर कभी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा। उनकी छवि निष्कलंक बनी रही।

जनरल साहब केवल एक राजनेता नहीं थे, वे एक भरोसा थे… एक अनुशासन थे… और पहाड़ की सादगी व स्वाभिमान की जीवित पहचान थे।

उनका निधन एक अपूरणीय क्षति है।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
विनम्र श्रद्धांजलि।

——————————————————————————
(लेखक भाजपा नेता और बीकेटीसी के पूर्व अध्यक्ष हैं। यह लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

 

Show More

The News Adda

The News अड्डा एक प्रयास है बिना किसी पूर्वाग्रह के बेबाक़ी से ख़बर को ख़बर की तरह कहने का आख़िर खबर जब किसी के लिये अचार और किसी के सामने लाचार बनती दिखे तब कोई तो अड्डा हो जहां से ख़बर का सही रास्ता भी दिखे और विमर्श का मज़बूत मंच भी मिले. आख़िर ख़बर ही जीवन है.

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!