
- उत्तराखंड के नए राज्यपाल बने डॉ. ढाल सिंह बिसेन, दुष्यंत गौतम सिक्किम राजभवन भेजे गए

देहरादून। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को छह राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति और फेरबदल को मंजूरी दी। इस बदलाव में उत्तराखंड को नया राज्यपाल मिला है, जबकि प्रदेश भाजपा के पूर्व प्रभारी रहे दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। डॉ. ढाल सिंह बिसेन अब उत्तराखंड के नए राज्यपाल होंगे। वे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह की जगह लेंगे। इन नियुक्तियों के साथ ही देश के छह राज्यों के राजभवनों में नई जिम्मेदारियों का दौर शुरू होगा।
कौन हैं उत्तराखंड के नए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन?
डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति के साथ राज्य में राजभवन की जिम्मेदारी में बदलाव होगा। जैसा कि आप जानते हैं कि राज्यपाल का पद संवैधानिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार के गठन, विधानसभा से पारित विधेयकों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और विश्वविद्यालयों से जुड़े दायित्वों में राज्यपाल की भूमिका रहती है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में उच्च शिक्षा, आपदा प्रबंधन, सीमांत क्षेत्रों का विकास, पलायन और युवाओं के अवसर जैसे विषय सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में हैं। नए राज्यपाल के कार्यकाल में इन मुद्दों पर राजभवन की प्राथमिकताएं कैसी रहती हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
उत्तराखंड के नए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन: डॉक्टर से विधायक, मंत्री और अब राजभवन तक का सफर
चार बार मध्य प्रदेश विधानसभा पहुंचे, शिवराज सरकार में संभाले कई विभाग | 2019 में बालाघाट से लोकसभा पहुंचे, अब उत्तराखंड के संवैधानिक प्रमुख की जिम्मेदारी
उत्तराखंड के नए राज्यपाल नियुक्त किए गए डॉ. ढाल सिंह बिसेन मध्य प्रदेश की राजनीति का जाना-पहचाना नाम हैं। चिकित्सा और कृषि से जुड़े पेशेवर जीवन से सार्वजनिक जीवन में आए बिसेन चार बार मध्य प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में शिक्षा, जेल, वन, परिवहन और खनन जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभालने के बाद वह 2019 में बालाघाट लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त किया है।
सिवनी में जन्म, चिकित्सा की पढ़ाई और राजनीति में प्रवेश
डॉ. ढाल सिंह बिसेन का जन्म 14 मई 1952 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के पिपरिया में हुआ। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि चिकित्सा से जुड़ी रही है। लोकसभा की सदस्य-जीवनी के अनुसार उन्होंने रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्वेदिक कॉलेज से आयुर्वेद विज्ञानाचार्य तथा आधुनिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा से संबंधित डिप्लोमा की पढ़ाई की। उनका पेशा चिकित्सा के साथ कृषि भी रहा है।
चार बार विधायक, मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री
बिसेन का विधानसभा का राजनीतिक सफर 1990 में शुरू हुआ। वह 1990 से 2008 के बीच चार बार मध्य प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इस दौरान उन्हें राज्य सरकार में मंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2003-04 के दौरान उन्होंने वन, परिवहन और खनन विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद 2004-05 में वह स्कूल शिक्षा और जेल विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे। इन जिम्मेदारियों के चलते उनका अनुभव प्राकृतिक संसाधनों, परिवहन, शिक्षा और जेल प्रशासन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों तक फैला रहा।
वर्ष 2012-13 में उन्होंने मध्य प्रदेश राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। इस पद पर स्थानीय निकायों और वित्तीय संसाधनों से संबंधित विषय महत्वपूर्ण होते हैं।
2019 में बालाघाट से पहुंचे लोकसभा
मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद बिसेन 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर बालाघाट संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए। वह 17वीं लोकसभा के सदस्य रहे और उनका कार्यकाल 2024 में समाप्त हुआ।
सांसद के रूप में उनका संसदीय रिकॉर्ड भी उल्लेखनीय आंकड़े प्रस्तुत करता है। PRS India के उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 99 प्रतिशत रही। उन्होंने 73 बहसों में भाग लिया और 189 सवाल पूछे। आपको बता दें कि ये आंकड़े 1 जून 2019 से 10 फरवरी 2024 तक के संसदीय रिकॉर्ड पर आधारित हैं।
बालाघाट और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े विषय उनके संसदीय हस्तक्षेप का हिस्सा रहे। लोकसभा में उन्होंने बालाघाट में सरकारी मेडिकल कॉलेज की आवश्यकता का मुद्दा उठाया था। अपने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, वन क्षेत्र और दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का उल्लेख करते हुए उन्होंने बेहतर चिकित्सा सुविधा की जरूरत बताई थी।
मध्य प्रदेश से उत्तराखंड तक: अब संवैधानिक जिम्मेदारी
राजनीति और सरकार में कई दशकों के अनुभव के बाद डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। उनके सामने अब निर्वाचित प्रतिनिधि या मंत्री की भूमिका नहीं, बल्कि संविधान के अनुरूप राज्यपाल के दायित्व निभाने की जिम्मेदारी होगी।
उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौतियां, उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयों का संचालन, सीमांत इलाकों के विषय और राज्य की संवैधानिक संस्थाओं के साथ समन्वय उनके कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण रहेंगे।
बिसेन की नियुक्ति के साथ उत्तराखंड के राजभवन में नेतृत्व परिवर्तन होगा। उनका पूर्व अनुभव राज्यपाल के रूप में उनके कामकाज में किस तरह परिलक्षित होता है, यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी।
“आदरणीय डॉ. Dhal Singh Bisen जी को देवभूमि उत्तराखण्ड के राज्यपाल नियुक्त होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
मध्य प्रदेश सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री, पूर्व सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में आपका दीर्घ राजनीतिक अनुभव, जनसेवा के प्रति समर्पण एवं सार्वजनिक जीवन में योगदान उल्लेखनीय रहा है।
माँ गंगा एवं बाबा केदार से आपके सफल, यशस्वी एवं मंगलमय कार्यकाल की कामना करता हूँ।”

दुष्यंत गौतम को सिक्किम की जिम्मेदारी, उत्तराखंड से रहा है संगठनात्मक जुड़ाव
दुष्यंत कुमार गौतम उत्तराखंड भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं। प्रदेश संगठन के साथ उनके जुड़ाव के कारण उनकी नई नियुक्ति उत्तराखंड की राजनीति के संदर्भ में भी चर्चा का विषय है। अब उन्हें सिक्किम के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारियों से लेकर संवैधानिक पद तक का यह बदलाव गौतम की राजनीतिक यात्रा का नया अध्याय है। उत्तराखंड में पार्टी के संगठनात्मक समीकरणों और नेताओं के बीच समन्वय के संदर्भ में उनकी भूमिका पहले चर्चा में रही है। पिछले दिनों कई वजहों से दुष्यंत गौतम को लेकर हल्ला मचा था जिसके बाद संभवतया उनकी प्रभारी पद से छुट्टी भी हुई थी।

उत्तराखंड में 2027 से पहले बदलाव के क्या हैं मायने? उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में राज्यपाल की नियुक्ति और भाजपा के पूर्व प्रदेश प्रभारी को दूसरे राज्य में संवैधानिक जिम्मेदारी दिए जाने जैसे घटनाक्रम राजनीतिक चर्चा को स्वाभाविक रूप से जन्म देते हैं।
छह राज्यों में किसे मिली जिम्मेदारी?
राष्ट्रपति की ओर से घोषित नियुक्तियों के अनुसार छह राज्यों में ये बदलाव किए गए हैं।
* उत्तराखंड: डॉ. ढाल सिंह बिसेन
* सिक्किम: दुष्यंत कुमार गौतम
* केरल: ओम प्रकाश माथुर
* तमिलनाडु: राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर
* ओडिशा: ब्रज मोहन राम
* कर्नाटक: डॉ. सुधा यादव
इन नियुक्तियों में कुछ राज्यों को नए राज्यपाल मिले हैं, जबकि कुछ में मौजूदा राज्यपालों को दूसरी जिम्मेदारी दी गई है।
उत्तराखंड की नजर अब नए राज्यपाल के कार्यकाल पर
उत्तराखंड में राज्यपाल का पद केवल औपचारिक संवैधानिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में भूमिका, उच्च शिक्षा से जुड़े विषय और संवैधानिक संस्थाओं के साथ समन्वय भी इस पद को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
डॉ. ढाल सिंह बिसेन की नियुक्ति के बाद अब यह देखना होगा कि वह उत्तराखंड की परिस्थितियों, उच्च शिक्षा और राज्य से जुड़े प्रमुख विषयों को लेकर किस तरह की प्राथमिकताएं तय करते हैं। वहीं, दुष्यंत गौतम की सिक्किम में नई भूमिका राष्ट्रीय राजनीति और संवैधानिक नियुक्तियों के लिहाज से चर्चा में रहेगी।



