एक परिवार-एक टिकट का राग वंशवाद बचाएगा ये क्लॉज: उदयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस ने गांधी-वाड्रा ही नहीं हरदा-हुड्डा-गहलोत सबके परिवारवाद को बचाने का खोज लिया फ़ॉर्मूला

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  • राजस्थान के उदयपुर में 13 से 15 मई तक कांग्रेस का नव संकल्प चिंतन शिविर
  • आगामी 11 राज्यों के विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बनेगा रोडमैप
  • नेतृत्व और नीतियों के कई अनसुलझे सवालों का खोजा जा रहा जवाब

Congress Chintan Shivir: 137 साल पुरानी ग्रैंड ऑल्ड पार्टी कांग्रेस राजस्थान के उदयपुर में चिंतन शिविर में अपने हाल और भविष्य के सवाल को लेकर महामंथन कर रही है। कांग्रेस इस चिंतन-मंथन के लिए तब बैठी है, जब वह 10 साल की सत्ता के बाद 2014 में गिरकर 44 सीटों और 2019 में बढ़कर 52 सीटों पर ठहर गई। इस दौरान कांग्रेस ने लगातार दो लोकसभा चुनावों में अपनी बुरी गत नहीं कराई बल्कि इस दौरान हुए 49 विधानसभा चुनावों में से 39 में हार का मुँह देखना पड़। ताजा हाल कुछ समय पहले हुए पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में दिखा जब कांग्रेस को यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर की 690 सीटों में महज 55 सीटों पर सिमटना पड़ा। कांग्रेस की पांच राज्यों में टोटल परफ़ॉर्मेंस के मुकाबले भाजपा ने अकेले उत्तराखंड में महज आठ सीटें कम जीतीं हैं। यानी आज कांग्रेस किस खस्ताहाल अवस्था में पहुंच चुकी है, उसका अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है।

अब जब पार्टी के सामने इस साल हिमाचल और गुजरात विधानसभा के चुनावों की चुनौती है, जहां उसे दोनों राज्यों की सत्ता पर क़ाबिज़ भाजपा को बेदख़ल करके दिखाना होगा। तो वहीं अगले साल यानी 2023 में उसको चिंतन शिविर जिस धरती पर हो रहा उसी राजस्थान के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की अपनी सरकार बचाने का राजनीतिक करिश्मा करना होगा और उसे मध्यप्रदेश व कर्नाटक में भाजपा तथा तेलंगाना में टीआरएस का रथ रोकना होगा। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव की चुनौती से दरपेश होना होगा, जहां उसे अपने ऊपर मँडरा रहे हार की हैट्रिक के खतरे को टालने की अग्निपरीक्षा देनी होगी।

कांग्रेस के सामने मौजूदा दौर में सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व के सवाल का हल और परिवारवाद के दाग की धुलाई को लेकर है। पार्टी को एक अदद फुलटाइम राष्ट्रीय अध्यक्ष की सख्त दरकार क्योंकि एडॉक बेसिस पर पार्टी की गतिविधियों का परिणाम है कि चुनाव दर चुनाव हार झेलनी पड़ रही और असंतुष्ट नेताओं का G23 अलग से फजीहत का सबब बन रहा। परिवारवाद का टैग दूसरा ऐसा मसला है जो मोदी दौर में कांग्रेस के लिए कठिनाई का कारण बन रहा है और राहुल गांधी लगातार ‘एक परिवार एक टिकट’ की रट से इस दाग को धोना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस के नव संकल्प चिंतन शिविर के पहले दिन निकले अमृत से साफ हो गया कि अभी भी कांग्रेस में ‘परिवारवाद: दाग अच्छे हैं!’ वाली स्थिति कायम रहने वाली है।

पार्टी दिखाना तो चाह रही कि वह एक परिवार एक टिकट के फ़ॉर्मूले पर आगे बढ़ेगी लेकिन यह व्यवस्था ‘कंडीशन अप्लाई’ के क्लॉज के साथ रहेगी। अगर कोई नेता पुत्र-पुत्री चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उन्हें पांच साल पार्टी संगठन में रहकर कामकाज का तजुर्बा होना चाहिए। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि सोनिया-राहुल क्रमश: वर्तमान अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष के नाते ऐसे किसी मानदंड के बंधन में नहीं आएंगे और प्रियंका गांधी वाड्रा 2017 में कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव बन गई थी लिहाजा वे भी चुनाव लड़ने की पात्र हो गई हैं।

सिर्फ गांधी-वाड्रा परिवार ही नहीं बल्कि चाहे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हों या हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा या फिर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हों सभी के बेटे-बेटियों के लिए कांग्रेस से चुनाव लड़ने का रास्ता आगे भी खुला रहेगा। दीपेन्द्र हुड्डा राज्यसभा सांसद हैं ही पिता हुड्डा हरियाणा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और विधानसभा चुनाव में सीएम चेहरे भी हों तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। इसी तरह हरदा की पुत्री अनुपमा रावत विधायक बन चुकी हैं और पुत्र वीरेन्द्र रावत और आनंद रावत के लिए भी कांग्रेस से चुनाव लड़ने का रास्ता बंद नहीं हुआ है। जबकि अशोक गहलोत खुद सीएम हैं और बेटे वैभव गहलोत के लिए आगे भी चुनाव लड़ने के रास्ते खुले रहेंगे। इसी तर्ज पर परिवारवाद के पुष्क कांग्रेस में हिमाचल सहित तमाम राज्यों में खिलते रहेंगे। यानी परिवारवाद पर सारी कवायद ‘कंडीशन अप्लाई’ के क्लॉज में हवा हो गई है।


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