
- उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने, ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार, हैंगिंग ग्लेशियरों और हिमस्खलन के खतरे के बीच एक नई रिपोर्ट ने राज्य की आपदा तैयारियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन की ओर से तैयार रिपोर्ट “उत्तराखंड ऐट अ क्लाइमेट क्रॉसरोड्स – व्हाट फोर इयर्स ऑफ डिजास्टर रिपोर्टिंग टेल अस अबाउट ग्लेशियर्स, ग्लोफ एंड एवलांचेस” शनिवार को देहरादून प्रेस क्लब में जारी की गई।
- उत्तराखंड में ग्लेशियरों का बढ़ता खतरा: 13 ग्लेशियल झीलें, 219 हैंगिंग ग्लेशियर और चारधाम के ग्लेशियरों का तेज रिट्रीट

देहरादून: उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों के पीछे हटने, ग्लेशियल झीलों के बढ़ने, हैंगिंग ग्लेशियरों के अस्थिर होने और मौसम के लगातार बदलते पैटर्न ने आने वाले वर्षों के लिए खतरे की नई तस्वीर खड़ी कर दी है। चार वर्षों की आपदा रिपोर्टिंग के विश्लेषण के आधार पर तैयार रिपोर्ट ने चेताया है कि उत्तराखंड में खतरे की पहचान तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन खतरे की पहचान और समय पर कार्रवाई के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है।
सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज (SDC) फाउंडेशन की रिपोर्ट “Uttarakhand at a Climate Crossroads– What Four Years of Disaster Reporting Tell Us About Glaciers, GLOFs and Avalanches” अक्टूबर 2022 से जून 2026 तक के घटनाक्रमों और रिपोर्टिंग का विश्लेषण करती है। रिपोर्ट में ISRO, NDMA, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, ICIMOD, IITs, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्षों को भी संदर्भित किया गया है।

13 ग्लेशियल झीलें बनीं सबसे बड़ी चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में NDMA ने उत्तराखंड में 13 संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की थी। इनमें 5 झीलें सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखी गईं।
अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर
रिपोर्ट का दूसरा बड़ा खुलासा अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान है। इनमें करीब 30 फीसदी ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में हैं, जहां बदरीनाथ और माणा जैसे संवेदनशील इलाके स्थित हैं।
अध्ययन के अनुसार करीब 0.7 घन किलोमीटर बर्फ अस्थिर हैंगिंग मास के रूप में मौजूद है। ऐसे ग्लेशियरों के टूटने की स्थिति में सड़कें, बस्तियां और तीर्थ मार्ग प्रभावित हो सकते हैं और नदियों के अवरुद्ध होने से आगे फ्लैश फ्लड जैसे खतरे भी पैदा हो सकते हैं।
अध्ययन में 4,000 से 6,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इन ग्लेशियरों का औसत ढलान करीब 33 डिग्री बताया गया है। सिमुलेशन में बदरीनाथ, माणा और हनुमानचट्टी सहित सड़क व ट्रैकिंग रूट प्रभावित होने की आशंका सामने आई। बदरीनाथ-माणा सेक्टर में संभावित एवलॉन्च फ्लो की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक तक पहुंचने का अनुमान भी अध्ययन में सामने आया है।चारधाम के ग्लेशियर भी तेजी से पीछे हट रहे
रिपोर्ट में चारधाम क्षेत्र के ग्लेशियरों को लेकर भी गंभीर तस्वीर सामने रखी गई है।
* गंगोत्री ग्लेशियर: 22.3 मीटर प्रति वर्ष
* यमुनोत्री ग्लेशियर: 20 मीटर प्रति वर्ष
रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ता तापमान, बर्फबारी में बदलाव और अनियमित वर्षा इसके प्रमुख दबावों में शामिल हैं। दूसरी ओर चारधाम क्षेत्रों में बढ़ती तीर्थयात्री संख्या भी संवेदनशील पर्वतीय इलाकों में मानव जोखिम बढ़ा रही है।
हिमालय में 30 साल में 1,000 से ज्यादा नई ग्लेशियल झीलें
रिपोर्ट में उद्धृत 2026 के एक अध्ययन के अनुसार 1990 के बाद हिमालय में 1,000 से अधिक नई ग्लेशियल झीलें बनी हैं। हालिया इन्वेंट्री में ग्लेशियल झीलों की संख्या 8,000 से अधिक बताई गई है।
इतना ही नहीं, मौजूदा झीलों के आकार में भी पिछले तीन दशकों में 26 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। बड़ी झीलों में जमा पानी बढ़ने के साथ उनके फटने की स्थिति में GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा भी बढ़ सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 21वीं सदी में बर्फ के नुकसान की औसत रफ्तार 20वीं सदी के आखिरी दौर की तुलना में करीब दोगुनी रही है। इसका सीधा असर पर्वतीय नदियों, पारिस्थितिकी और नीचे रहने वाली आबादी पर पड़ सकता है।मौसम का बदलता मिजाज भी नई चुनौती
रिपोर्ट के पांचवें बड़े पैटर्न में मौसम के बदलते स्वरूप को प्रमुख चिंता बताया गया है। लंबे समय तक सूखा या कम बर्फबारी के बाद अचानक बेहद तेज बारिश या बर्फबारी जैसी स्थितियां पर्वतीय क्षेत्रों में अस्थिरता बढ़ा सकती हैं।
मार्च 2025 का माणा एवलॉन्च इसका उदाहरण बताया गया है, जब लंबे समय तक कम शीतकालीन वर्षण के बाद थोड़े समय में अत्यधिक वर्षण हुआ। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे बदलाव बर्फ की परत और पर्वतीय ढलानों को अस्थिर कर सकते हैं।
असली सवाल: खतरा बढ़ रहा है या हमारी तैयारी पीछे है?
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यही है कि समस्या अब सिर्फ “खतरे की जानकारी नहीं है” वाली नहीं रह गई है। वैज्ञानिक संस्थाएं और सरकारी एजेंसियां खतरनाक झीलों, अस्थिर ग्लेशियरों और संवेदनशील इलाकों की पहचान कर रही हैं, लेकिन मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को जमीन पर लागू करने में देरी चिंता बढ़ाती है।
इसी के साथ दूसरी बड़ी चुनौती बढ़ता मानवीय दबाव है। सड़कें, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, पर्यटन, तीर्थयात्रा, बस्तियां और दूसरी आधारभूत संरचनाएं ऐसे क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं जहां प्राकृतिक खतरे पहले से मौजूद हैं।
अलकनंदा बेसिन के अध्ययन में संवेदनशील क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्र 2000 के करीब 8,000 वर्गमीटर से बढ़कर 2030 तक 1.5 लाख वर्गमीटर से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट के 5 बड़े सुझाव
1. क्रायोस्फीयर और क्लाइमेट रिस्क प्रोग्राम बने
ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी हो और वैज्ञानिक निष्कर्षों को जिला स्तर की योजना से जोड़ा जाए।
2. आपदा आने के बाद नहीं, पहले तैयारी
हाई रिस्क ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम तेजी से लगाए जाएं। इसकी स्थापना, मॉनिटरिंग और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। सैटेलाइट डेटा, ग्राउंड सर्वे और स्थानीय लोगों के अवलोकन को एक साथ इस्तेमाल किया जाए।
3. चारधाम की कैरिंग कैपेसिटी में क्लाइमेट रिस्क शामिल हो
सिर्फ सड़क, पानी, होटल और कचरे की क्षमता नहीं, बल्कि ग्लेशियर रिट्रीट, भूस्खलन, एवलॉन्च, GLOF और आपातकालीन निकासी क्षमता को भी कैरिंग कैपेसिटी का हिस्सा बनाया जाए।
4. संवेदनशील क्षेत्रों में विकास पर सख्ती
बड़े प्रोजेक्टों का आकलन अलग-अलग नहीं बल्कि पूरे लैंडस्केप के cumulative impact और multi-hazard vulnerability के आधार पर किया जाए। हाई रिस्क क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबंधित या बेहद सख्त किया जाए।
5. स्थानीय समुदायों को बनाया जाए पहली सुरक्षा पंक्ति
पर्वतीय गांवों में रहने वाले लोग मौसम, बर्फ, नदी और ढलानों में होने वाले बदलावों को सबसे पहले महसूस करते हैं। इसलिए स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक मॉनिटरिंग से जोड़ते हुए गांव स्तर की आपदा योजनाओं को मजबूत करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट वैज्ञानिक अध्ययन नहीं, मीडिया आधारित विश्लेषण
फाउंडेशन ने स्पष्ट किया है कि यह रिपोर्ट कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है। यह मीडिया आधारित विश्लेषण है, जिसमें विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों को विभिन्न संस्थानों और वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्षों के साथ क्रॉस-रेफरेंस किया गया है।
इसके लिए इसरो, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, आईसीआईएमओडी और विभिन्न विश्वविद्यालयों के अध्ययन एवं निष्कर्षों को भी संदर्भ के रूप में लिया गया है। रिपोर्ट में अक्टूबर 2022 से जून 2026 तक सामने आए 28 अलग-अलग मीडिया अपडेट्स का विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट जारी करते हुए अनूप नौटियाल ने हाल की आपदा से प्रभावित नेपाल के लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नेपाल और उत्तराखंड दोनों हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं और कई समान पर्यावरणीय एवं आपदा संबंधी चुनौतियों का सामना करते हैं।
उन्होंने कहा कि आपदाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उन्हें उत्तराखंड के तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण के संकेत के तौर पर देखना होगा। इसके लिए बेहतर तैयारी, जवाबदेही और दीर्घकालिक योजना जरूरी है।
अनूप नौटियाल ने बताया कि रिपोर्ट संबंधित सरकारी विभागों और संस्थानों के साथ भी साझा की जाएगी, ताकि इसके निष्कर्षों पर विचार कर आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
रिपोर्ट इसी बदलाव की जरूरत बताती है कि “Response” से “Preparedness and Prevention” की ओर। स्थानीय समुदायों को भी इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर रिपोर्ट खास जोर देती है।



