अड्डा In-depth: सीएम के उपचुनाव पर संवैधानिक संकट; क्या तीरथ सिंह रावत को सितंबर तक के लिए ही भेजा गया? उत्तराखंड बना बीजेपी की पॉलिटिकल लैबोरेटरी

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देहरादून: क्या बीजेपी ने 2022 की बैटल से पहले ही खुद कर लिया कबाड़ा! क्या जानबूझकर मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को सल्ट सीट से उपचुनाव लड़ने से रोका गया? या फिर तीरथ का टाइम सितंबर तक ही सैट किया गया था? दिल्ली में मौजूद प्रदेश के दो चेहरों में क्या फिर छिड़ेगी कुर्सी की दौड़? उत्तराखंड को अपनी पॉलिटिकल लैबोरेटरी बना चुका बीजेपी नेतृत्व सितंबर में कौनसा एक्सपेरिमेंट्स करने जा रहा है?

ये तमाम सवाल इसलिए उठ रहे है क्योंकि उत्तराखंड में विधानसभा के दो-दो सीट सिटिंग विधायकों के आकस्मिक निधन के चलते खाली होने के बावजूद अब उपचुनाव का रास्ता बनता नही दिख रहा है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम यानी Representation of the People Act 1951 के सेक्शन 151 A के तहत भारतीय निर्वाचन आयोग के लिए लोकसभा या विधानसभा की रिक्त सीट पर छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। बशर्ते कि उक्त सीट की अवधि एक वर्ष या उससे अधिक हो यानी लोकसभा या विधानसभा का कार्यालय एक वर्ष या अधिक हो तभी उपचुनाव संभव होगा, अन्यथा उपचुनाव नहीं कराया जाएगा।

चुनाव आयोग ने महज तीन साल पहले 2018 में इसी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत कर्नाटक की तीन लोकसभा सीटों- बेल्लारी, शिमोगा और मान्डया में उपचुनाव कराए लेकिन आंध्रप्रदेश की पांच रिक्त लोकसभा सीटों पर नहीं कराया। आयोग ने तब तथ्य रखते हुए कहा था कि कर्नाटक की तीन सीटो पर इसलिए उपचुनाव हो रहा क्योंकि उनमें से दो सीट 18 मई 2018 और तीसरी 21 मई को रिक्त होती है। जबकि आंध्रप्रदेश की पाँचों सीट 20 जून को रिक्त हुई। आयोग ने दलील दी कि चूंकि 16 वीं लोकसभा का कार्यकाल 3 जून 2019 को पूरा हो रहा है लिहाजा कर्नाटक की तीन सीटों के रिक्त होने का समय लोकसभा कार्यकाल खत्म होने से एक वर्ष से अधिक रहा इसलिए वहां उपचुनाव करा दिए गए। जबकि आंध्रप्रदेश की पांच सीटें जब रिक्त हुई तब 16वीं लोकसभा की समयावधि अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुकी थी लिहाजा वहां उपचुनाव नहीं हो सकते।
उत्तराखंड की चौथी विधानसभा का कार्यकाल 23 मार्च 2022 तक निर्धारित है ऐसे में कहा जा सकता है कि अब संवैधानिक तौर पर उत्तराखंड में उपचुनाव नहीं हो सकते।


अब दूसरे विकल्प की बात करते हैं। तो क्या संभव है कि सीएम तीरथ का नौ सितंबर को छह माह का कार्यकाल पूरा होते ही इस्तीफा कराकर फिर शपथ दिलाकर छह महीने के लिए मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा? या संवैधानिक संकट का हवाला देते हुए अल्पावधि को राष्ट्रपति शासन लगाकर फिर तीरथ के सिर बिना विधानसभा सदस्यता लिए छह महीने को ताज रख दिया जाए?
अब ये भी कतई संभव नहीं होने वाला है क्योंकि ऐसा न करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ संदेश दे रहा है।


S R Chaudhuri vs State of Punjab and others(2001)
एस आर चौधरी बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य केस (2001) ऊपर दी गई परिस्थिति का स्पष्ट जवाब है। यहाँ पूरा केस समझिए:-
हुआ यूं कि 9 सितंबर 1995 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री सरदार हरचरण सिंह बरार ने तेज प्रकाश सिंह को अपनी कैबिनेट में मंत्री बना दिया। तेज प्रकाश सिंह पंजाब विधानसभा के सदस्य नहीं थे लिहाजा उनको छह महीने के अंदर सदन का सदस्य बनना था लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। लिहाजा 8 मार्च 1996 को मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया। इसी दौरान सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हो जाता है और बरार की जगह अब मुख्यमंत्री बन जाती हैं राजिन्दर कौर भट्टल और वे तेज प्रकाश सिंह को 23 नवंबर 1996 को अपनी सरकार में मंत्री बना देती हैं। हालांकि अब तक भी तेज प्रकाश सिंह पंजाब विधानसभा के सदस्य नहीं बन पाए थे। इसे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करार देते हुए एस आर चौधरी पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देते हैं लेकिन 3 दिसंबर 1996 को हाइकोर्ट याचिका खारिज कर देता है।

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट में आर्टिकल 164 से लेकर आर्टिकल 164(4) पर नए सिरे से रोशनी डाली जाती है। दरअसल आर्टिकल 164(4) ही इजाज़त देता है कि कोई सदन का सदस्यों न रहते भी मंत्री-मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बन सकता है लेकिन उन्हें एक सीमित समयावधि, जो छह माह अधिकतम होती है, के अंदर सदन का सदस्य बनना होगा। आर्टिकल 164(4) पर संविधान सभा में सांसद मोहम्मद ताहिर और डॉ भीमराव अंबेडकर में ज़बरदस्त बहस भी हुई थी और बाबा साहब ने इसकी जरूरत बताई थी जिसके बाद इसे स्वीकार किया गया।


हालांकि आर्टिकल 164(4) को सबसे पहले हर शरण वर्मा बनाम श्री त्रिभुवन नारायण सिंह, मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश एवं अन्य केस (1971) में चुनौती दी गई। इसी याचिकाकर्ता ने इसे दोबारा हर शरण वर्मा बनाम स्टेट ऑफ यूपी अन्य केस (1985) में चुनौती दी गई। सीता राम केसरी को बिना संसद सदस्य बने मंत्रीपद देने पर हर शरण बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (1987) में चुनौती दी गई। और 1996 में एचडी देवेगौड़ा के बिना संसद के किसी भी सदन का सदस्य बने प्रधानमंत्री बनाने पर भी एसपी आनंद बनाम एचडी देवेगौड़ा व अन्य केस में चुनौती दी गई थी।
ऐसे तमाम मामलों से लेकर एस आर चौधरी बनाम पंजाब राज्य व अन्य (2001) केस तक आर्टिकल 164(4) की अहमियत स्वीकार की जाती रही। लेकिन छह माह की निरंतर अवधि तक मंत्री/ मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री रहने के बावजूद संसद या विधानसभा सदन का सदस्य नही बन पाने पर दोबारा संरक्षण नहीं होता है। राजिन्द्र कौर भट्टल ने तेज प्रकाश को उसी टर्म के दौरान बिना विधानसभा सदस्य बने दोबारा मंत्री बनाकर संवैधानिक प्रावधानों को नजरअंदाज करने का कार्य किया था।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर लगातार छह माह बिना सदन सदस्य रहे व्यक्ति को उस विधानसभा कार्यकाल में दोबारा मौका नही दिया जा सकता है। ऐसा करने संविधान को पलटना, संवैधानिक परम्पराओं के विपरीत और अनुचित, अलोकतांत्रिक और अवैध होगा। यानी तीरथ सिंह रावत को जैसे 10 मार्च को मुख्यमंत्री बनाया गया था ठीक वैसे दोबारा मौका नहीं मिल सकता है।

अब सवाल उठता है बीजेपी के पॉलिटिकल लैबोरेटरी उत्तराखंड में नए एक्सपेरिमेंट को लेकर कि क्या किसी न किसी संवैधानिक खिड़की, दरार का सहारा लेकर चुनाव आयोग मददगार साबित होगा? हालांकि आयोग के सामने 2018 की कर्नाटक की तीन लोकसभा सीटों के उपचुनाव और आँध्र प्रदेश की पांच सीटों पर उपचुनाव नहीं कराने संबंधी दलील आड़े आएगी।
एक और विकल्प होगा तीसरी बार चेहरा बदल दिया जाए और तीरथ को पौड़ी लोकसभा का सांसद ही रहने दिया जाए और ठीक चुनाव से पहले नया मुख्यमंत्री बना दिया जाए। खंडूरी-निशंक-खंडूरी तर्ज पर त्रिवेंद्र-तीरथ-त्रिवेंद्र फ़ॉर्मूला दोहराने का विकल्प भी सामने होगा लेकिन इसके चांसेज कम ही ठहरे बल!

एक विकल्प राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए और फ़ेवरेबल समय पर चुनाव करा लिए जाएं। या फिर समय पूर्व विधानसभा चुनाव का बिगुल ही फूँका जाए।

बहरहाल इस संवैधानिक संकट का ज़िम्मेदार कोई और नहीं खुद बीजेपी का राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व ज़िम्मेदार है। वरना सल्ट उपचुनाव का विकल्प मुख्यमंत्री तीरथ के सामने था और आसानी से इस संकट से बचा जा सकता था।
या फिर यों क्यों ना सोचा जाए कि बीजेपी के चतुर राष्ट्रीय नेतृत्व ने किसी और दांव को अंजाम तक पहुँचाने के लिए जानबूझ कर पटकथा को इस मोड़ पर खड़ा कर दिया है।

हालाँकि मुख्यमंत्री के उपचुनाव को लेकर चुनाव आयोग अपवाद स्वरूप चुनाव करा सकता है। ये बेनेफिट सीएम तीरथ रावत को मिलेगा इस संवैधानिक संकट से निकले के लिए।


इस सब के बीच प्रदेश की जनता जरूर ये सोच सकती है तीन चौथाई बहुमत की सरकार देकर भी एक अदद स्थाई नेतृत्व नसीब क्यों नहीं हो पाया! आखिर नेतृत्व पर मंडराता ये संवैधानिक संकट अकेले बीजेपी के घर का मसला नहीं बल्कि प्रदेश के विकास से जुड़ा संवेदनशील मसला है। कल्पना करिए हफ्तेभर से ये हल्ला है कि सीएम तीरथ उपचुनाव लड़ पाएंगे या नहीं तब प्रदेश की सरकारी मशीनरी और नौकरशाही किस मनःस्थिति से कार्य कर रही होगी, सहज समझा जा सकता है।


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