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RTI खुलासा: उत्तराखंड में 25 साल में 46 हजार हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट, हरेला पर उठे बड़े सवाल

Harela 2026: 25 साल में उत्तराखंड की 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट, अकेले देहरादून पर 47% बोझ; अनूप नौटियाल ने उठाए बड़े सवाल

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  • Uttarakhand Forest Land Diversion Report: 46,203 हेक्टेयर वन भूमि गई विकास परियोजनाओं में, देहरादून सबसे आगे
  • RTI के आंकड़ों से खुलासा, हरेला पर विकास मॉडल की समीक्षा की मांग; सड़क, खनन और बड़ी परियोजनाओं को लेकर सरकार से पुनर्विचार की अपील

 

Dehradun | Adda Web Desk।

हरेला जैसे प्रकृति संरक्षण के पर्व पर उत्तराखंड (Uttarakhand) में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ( Anoop Nautiyal) ने सूचना के अधिकार (Right to Information- RTI) से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर दावा किया है कि राज्य गठन (नवंबर 2000) से जून 2026 तक उत्तराखंड में 46,203 हेक्टेयर वन भूमि( Forest Land) विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए डायवर्ट की गई है।

उन्होंने कहा कि ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना (Rishikesh- Bhaniyawala Four lane Project) के लिए हजारों पेड़ों की कटाई इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड का मौजूदा विकास मॉडल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से ऐसी परियोजनाओं की समीक्षा करने की अपील की जिनमें प्राकृतिक वनों का बड़े पैमाने पर और टाला जा सकने वाला नुकसान हो रहा है।

46 हजार हेक्टेयर वन भूमि कहां गई?RTI के अनुसार सबसे अधिक वन भूमि सड़क परियोजनाओं और खनन के लिए डायवर्ट की गई।

* सड़क परियोजनाएं: 10,070.03 हेक्टेयर (22%)
* खनन: 9,289.81 हेक्टेयर (20%)
* ट्रांसमिशन लाइनें: 3,005.51 हेक्टेयर (6.5%)
* विद्युत परियोजनाएं: 2,250.08 हेक्टेयर (5%)
* सिंचाई: 456.18 हेक्टेयर (1%)
* पेयजल परियोजनाएं: 294.56 हेक्टेयर (0.5%)
* अन्य श्रेणी: 20,837.63 हेक्टेयर (45%)

नौटियाल ने अन्य श्रेणी में शामिल 45 प्रतिशत वन भूमि डायवर्जन पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसमें कौन-कौन सी परियोजनाएं शामिल हैं।

सबसे ज्यादा दबाव देहरादून पर

RTI के आंकड़ों के अनुसार पिछले 25 वर्षों में हुए कुल वन भूमि डायवर्जन का लगभग 47 प्रतिशत अकेले देहरादून जिले में हुआ है।

जिला-वार आंकड़े इस प्रकार हैं—

* देहरादून: 21,618.32 हेक्टेयर (47%)
* हरिद्वार: 6,002.32 हेक्टेयर
* नैनीताल: 3,603.83 हेक्टेयर
* चमोली: 3,065.34 हेक्टेयर
* टिहरी गढ़वाल: 2,555.29 हेक्टेयर

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भविष्य में भी राज्य के वन भूमि डायवर्जन का सबसे बड़ा बोझ देहरादून और शिवालिक क्षेत्र ही उठाते रहेंगे, जबकि इन क्षेत्रों की पारिस्थितिक वहन क्षमता सीमित है।

जलवायु संकट के बीच बढ़ी चिंता

नौटियाल ने कहा कि यह आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब उत्तराखंड लगातार अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी घटनाओं का सामना कर रहा है। उनके अनुसार अवैज्ञानिक विकास का सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर और आपदा-प्रभावित समुदायों पर पड़ता है।

सिर्फ पौधारोपण नहीं, प्राकृतिक जंगल बचाना जरूरी

उन्होंने कहा कि RTI में प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। ऐसे में जनता को यह जानने का अधिकार है कि जिन हजारों हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ, उसकी भरपाई कहां और कैसे होगी।

उनका कहना है कि हिमालय के परिपक्व प्राकृतिक जंगलों की भरपाई केवल पौधे लगाने से संभव नहीं है, इसलिए मौजूदा प्राकृतिक वनों का संरक्षण ही जलवायु परिवर्तन के दौर में सबसे प्रभावी रणनीति है।

अनूप नौटियाल, संस्थापक, एसडीसी फाउंडेशन

क्या है उनकी मांग?अनूप नौटियाल ने सरकार से मांग की कि—

* बड़ी आधारभूत परियोजनाओं की पर्यावरणीय समीक्षा की जाए।
* पर्यटन, चारधाम यात्रा और शहरी विकास के लिए कैरिंग कैपेसिटी आधारित नियमन लागू किया जाए।
* पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव कानूनों का कड़ाई से पालन हो।
* पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
* जरूरत वाले क्षेत्रों को ईको-सेंसिटिव जोन घोषित किया जाए।
* प्राकृतिक वन, नदियों और जैव विविधता के संरक्षण में अधिक निवेश किया जाए।

RTI जानकारी पर गंभीरता से विचार की दरकार 

हरेला के मौके पर अनूप नौटियाल द्वारा पेश किए गए RTI के ये आंकड़े उत्तराखंड में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को फिर केंद्र में ले आए हैं। ऐसे समय जब एक ओर केंद्र-राज्य सरकार सड़क और आधारभूत ढांचे के विस्तार को विकास की आवश्यकता बता रही हैं, तब वहीं दूसरी ओर, पर्यावरणविद हिमालयी राज्य में बढ़ते वन भूमि डायवर्जन और जलवायु जोखिमों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा नीति और राजनीति, दोनों स्तरों पर चर्चा का अहम विषय बनना चाहिए ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की अहमियत नीति-नियंता बखूबी समझ सकें।
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The News Adda

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