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धामी पर ‘नवीन’ हामी; 2027 की तस्वीर खींच गए भाजपा अध्यक्ष नितिन

भाजपा ने धामी के नाम पर बजाया चुनावी बिगुल, राहुल के दौरे से कांग्रेस की अग्निपरीक्षा शुरू

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पवन लालचंद। अड्डा ट्रेंडिंग।

देहरादून। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का तीन दिवसीय उत्तराखंड दौरा इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा कि उन्होंने भाजपा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को लेकर समय-समय पर उठती रही अटकलों पर विराम लगा दिया है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राजनीतिक मिजाज समझने और पार्टी की प्रदेश इकाई की टोह लेने की कवायद में निकले नितिन नवीन ने उत्तराखंड दौरे में ऐसा राजनीतिक संदेश दे दिया है, जिसकी गूंज 2027 के विधानसभा चुनाव तक सुनाई दे सकती है। नवीन ने न केवल मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार भाजपा सरकार बनाने का लक्ष्य दोहराया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि पार्टी का पूरा राजनीतिक और चुनावी दांव धामी मॉडल पर ही लगा हुआ है।

दरअसल, उत्तराखंड में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा जीत को हैट्रिक लगाकर इतिहास रचना चाहती है, जबकि कांग्रेस दो चुनावी हार के बाद वापसी की जमीन तलाश रही है। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि 10 साल की सत्ता के बाद पैदा होने वाली स्वाभाविक सत्ता-विरोधी लहर भी है। संगठन इस चुनौती को समझता है और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले नेतृत्व को लेकर किसी भी तरह की अस्पष्टता खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।

 

नितिन नवीन का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोई अकेला बयान नहीं है। बीते कुछ समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी सार्वजनिक मंचों से मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व की सराहना कर चुके हैं। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन की मुहर ने इस धारणा को और मजबूत कर दिया है कि दिल्ली फिलहाल उत्तराखंड में किसी वैकल्पिक चेहरे की तलाश में नहीं है।

असंतुष्टों को भी संदेश

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह दौरा ऐसे समय हुआ जब भाजपा के भीतर कुछ हलचलें चर्चा में थीं। दौरे से ठीक पहले पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी और गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया। यहां तक कि लंबे समय से खफा चल रहे विधायक अरविंद पांडेय ने संगठन की बैठक में अपने खिलाफ लगाए गए भूमि संबंधी आरोपों की सीबीआई जांच की मांग तक उठा दी। हालांकि बाद में पांडेय की मुख्यमंत्री के साथ मुस्कुराती हुई तस्वीरें कुछ और कहानी भी बयां कर गईं।

दरअसल, उत्तराखंड भाजपा में यह कोई रहस्य नहीं है कि धामी के सियासी उभार के बाद कुछ पुराने शक्ति केंद्र कमजोर पड़े हैं और कई नेताओं को अपने लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी लगातार दूर होती दिख रही है। इस बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नवीन का मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व पर खुलकर भरोसा जताना महज़ चुनावी रणनीति नहीं बल्कि पार्टी के भीतर दिख रहे इस तरह के असंतोष को भी संदेश देना माना जा सकता है।

राजनीतिक जानकार योगेश कुमार ज़ोर देते हैं,”भाजपा हाईकमान 2027 के चुनाव से पहले किसी भी प्रकार के नेतृत्व विवाद को हवा नहीं देना चाहता। पार्टी को पता है कि उत्तराखंड में कांग्रेस भले कमजोर दिखे, लेकिन यदि भाजपा के भीतर असंतोष बढ़ा तो उसका सीधा नुकसान चुनाव में हो सकता है। इसलिए संगठन और सरकार को एक ही दिशा में साधने का प्रयास साफ दिखाई दे रहा है। नितिन नवीन का खुलकर मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व की सराहना करना, दिल्ली (शीर्ष नेतृत्व) क्या सोच रही है उसका इशारा कर देता है।”


धामी मॉडल पर दांव

नितिन नवीन के संदेश से साफ पता चलता है कि भाजपा नेतृत्व मानता है कि मुख्यमंत्री धामी ने समान नागरिक संहिता, सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून और नया निवेश आकर्षित करने जैसे कदम उठाकर एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई है। पार्टी का मानना है कि धामी की अपेक्षाकृत युवा छवि और आक्रामक निर्णय शैली 2027 में भी उसके लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

हालांकि चुनौती भी कम नहीं है। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं, पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, महंगाई और स्थानीय स्तर पर विधायकों के प्रति नाराजगी जैसे मुद्दे भाजपा के सामने मौजूद हैं। यह अलग बात है कि गणेश गोदियाल को कमान सौंपने के बावजूद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस में आंतरिक कलह और गुटबाजी सत्ताधारी दल भाजपा के लिए मददगार साबित हो रहा है।

भाजपा ने शंखनाद किया, अब कांग्रेस की बारी

भाजपा अध्यक्ष के दौरे के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा होने जा रहा है। चार और पांच जून को प्रस्तावित इस दौरे को कांग्रेस के लिए संगठनात्मक संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि राहुल गांधी 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उत्तराखंड नहीं आए थे। इस लिहाज से 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद यह उनका पहला बड़ा राजनीतिक दौरा माना जा रहा है। ऐसे में उनके कार्यक्रम को कांग्रेस कार्यकर्ता विशेष महत्व दे रहे हैं। राहुल गांधी गढ़वाल और कुमाऊं, दोनों मंडलों में जा रहे हैं यानी दो दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर प्रदेश के शीर्ष नेताओं के साथ राहुल 2027 की चुनावी व्यूह रचना पर महामंथन करेंगे।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल धी को उत्तराखंड दौरे में जहां 10 साल पूरे करने की तरफ बढ़ रही भाजपा सरकार पर निशाना साधना होगा, वहीं, अपनी पार्टी के भीतर भी ऊर्जा भरनी होगी। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में संगठन को नई दिशा देने की कोशिश हो रही है, लेकिन कांग्रेस की पुरानी बीमारी, गुटबाजी आड़े आ रही है। ऐसा नहीं होता तो गोदियाल सात-आठ महीने से अपनी कार्यकारिणी को लेकर दिल्ली की ओर नहीं ताक रहे होते।

बदलेगा कांग्रेस का समीकरण ?

राहुल गांधी का दौरा कई सवालों के जवाब तलाशेगा। क्या कांग्रेस 2027 के लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक रोडमैप पेश कर पाएगी? क्या पार्टी के विभिन्न गुट एक मंच पर दिखाई देंगे? क्या हरीश रावत की भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट संकेत मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या कांग्रेस भाजपा के खिलाफ ऐसा चुनावी नैरेटिव खड़ा कर पाएगी जो एक दशक के बाद पनपने वाली सत्ता विरोधी भावना को वोटों में बदल सके?

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत आज भी कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे हैं लेकिन उनकी राजनीति और रणनीति पर पार्टी भीतर और बाहर कई तरह के सवाल भी खड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं, पार्टी के भीतर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की चर्चा भी लगातार चल रही है। स्वाभाविक है कि राहुल गांधी की मौजूदगी में होने वाली बैठकों में यह संकेत मिल सकता है कि कांग्रेस 2027 में पुराने अनुभव और नए नेतृत्व के बीच किस संतुलन के साथ आगे बढ़ेगी।

बिछ चुकी है चुनावी बिसात

नितिन नवीन का दौरा और राहुल गांधी का प्रस्तावित कार्यक्रम संकेत दे रहे हैं कि उत्तराखंड में 2027 का चुनावी अभियान अनौपचारिक रूप से शुरू हो चुका है। भाजपा ने अपने पत्ते खोलते हुए स्पष्ट कर दिया है कि उसका चेहरा पुष्कर सिंह धामी होंगे। वहीं कांग्रेस अब यह तय करेगी कि उसका मुकाबला किस नेतृत्व, किस रणनीति और किस राजनीतिक नैरेटिव के साथ होगा।

फिलहाल राजनीतिक संदेश साफ है, दिल्ली ने धामी पर भरोसा जताया है। अब देखना यह है कि क्या यह भरोसा भाजपा को तीसरी बार सत्ता तक पहुंचाने का आधार बनता है या कांग्रेस राहुल गांधी के दौरे से नई राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत कर पाती है।

 

धामी को दिल्ली से अब तक मिले 5 बड़े समर्थन

 

1. प्रधानमंत्री मोदी का भरोसा
2022 विधानसभा चुनाव में सीट हारने के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाए रखा। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वास का सबसे बड़ा संकेत माना गया, जो अब और मजबूत होता दिख रहा।

2. चंपावत उपचुनाव के जरिए राजनीतिक पुनर्स्थापना
केंद्रीय नेतृत्व ने धामी को दोबारा विधानसभा में पहुंचाने के लिए पूरी ताकत झोंकी। रिकॉर्ड मतों से जीत ने उनके नेतृत्व को नई राजनीतिक वैधता दी।

3. लोकसभा चुनाव 2024 के बाद भी बरकरार विश्वास
उत्तराखंड की पांचों लोकसभा सीटों पर भाजपा की जीत की हैट्रिक के बाद दिल्ली नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से धामी सरकार के कामकाज की सराहना की।

4. मोदी-शाह-राजनाथ-नड्डा की लगातार प्रशंसा
पिछले दो वर्षों में राज्य के दौरों के दौरान शीर्ष नेतृत्व ने धामी सरकार के फैसलों- यूसीसी, नकल विरोधी कानून, ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और धार्मिक पर्यटन को उपलब्धि के रूप में पेश किया।

5. नितिन नवीन की खुली घोषणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उत्तराखंड के पहले दौरे पर आए नितिन नवीन ने धामी के नेतृत्व में 2027 का चुनाव जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य दोहराया। इसे मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर ताजा और सबसे स्पष्ट राजनीतिक मुहर माना जा रहा है।

राहुल के दौरे पर कांग्रेस की 5 बड़ी उम्मीदें

File photo
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1. गुटबाजी पर लगे विराम
कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद है कि राहुल गांधी की मौजूदगी राज्य इकाई के विभिन्न गुटों को एक मंच पर लाने में मदद करेगी।

2. कार्यकर्ताओं में नया उत्साह
लगातार चुनावी हार के बाद जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरना राहुल गांधी के दौरे का प्रमुख उद्देश्य माना जा रहा है।

3. गणेश गोदियाल को मजबूती
पिछले साल के आख़िर में प्रदेश अध्यक्ष बने गणेश गोदियाल के नेतृत्व को राहुल गांधी की उपस्थिति से पुरजोर समर्थन मिलता दिख सकता है।

4. हरीश रावत की भूमिका पर संकेत
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की चुनावी भूमिका और संगठन में उनकी उपयोगिता को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की निगाहें राहुल गांधी के संदेश पर रहेंगी। खासकर हरदा के अर्जित अवकाश प्रकरण के बाद पार्टी को राष्ट्रीय नेतृत्व में संदेश का इंतजार है।

5. 2027 का नैरेटिव तय करने की कोशिश
भाजपा जहां धामी के नेतृत्व और सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक लड़ाई की रूपरेखा तैयार करना चाहेगी। राहुल गांधी के दौरे से इसे धार मिले यह प्रदेश इकाई को आस है।

अड्डा इनसाइडर विश्लेषण

2027: किसके पास बढ़त, किसके सामने चुनौती?

उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता वापसी का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह नेतृत्व, संगठन और जनविश्वास की भी परीक्षा होगा।

भाजपा की ताकत

* मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के रूप में स्पष्ट नेतृत्व।
* केंद्र और राज्य में डबल इंजन सरकार का लाभ।
* मजबूत संगठनात्मक ढांचा और बूथ स्तर तक पहुंच।
* पीएम मोदी की लोकप्रियता आज भी सबसे बड़ा चुनावी कवच।

भाजपा की चुनौती

* दस साल की सत्ता के बाद स्वाभाविक सत्ता विरोधी माहौल।
* बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों पर बढ़ते सवाल।
* पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं को साधे रखने की जरूरत।
* लगातार तीसरी बार जनादेश हासिल करने की कठिन परीक्षा।

कांग्रेस की ताकत

* सत्ता विरोधी भावना को राजनीतिक समर्थन में बदलने का अवसर।
* बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और पलायन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की गुंजाइश।
* गोदियाल, प्रीतम, आर्य और हरक के अलावा हरदा जैसे अनुभवी नेता।
* राहुल गांधी के दौरे से संगठन में नई ऊर्जा की संभावना।

कांग्रेस की चुनौती

* गुटबाजी और फ्रंट फुट से लीड करने वाले नेतृत्व पर असमंजस।
* बूथ स्तर पर पार्टी संगठन को दोबारा खड़ा करने की जरूरत।
* भाजपा के मुकाबले संसाधनों और कैडर नेटवर्क की भारी कमी।
* मुख्यमंत्री चेहरे और चुनावी नैरेटिव को लेकर स्पष्टता का अभाव।

फिलहाल तस्वीर क्या कहती है?

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के दौरे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी ने 2027 के लिए अपना चेहरा तय कर लिया है और वह धामी के नेतृत्व में ही चुनावी मैदान में उतरना चाहती है। दूसरी ओर राहुल गांधी का दौरा कांग्रेस के लिए संगठनात्मक पुनरुद्धार का अवसर बन सकता है।

चुनावी बिसात अभी पूरी तरह नहीं बिछी है, लेकिन शुरुआती दौर में भाजपा राजनीतिक बढ़त बनाने में सफल दिख रही है। कांग्रेस के लिए अब चुनौती केवल भाजपा का मुकाबला करने की नहीं, बल्कि स्वयं को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करने की भी है।

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