
देहरादून, 26 अगस्त। उत्तराखंड की नदियां, जल और प्राकृतिक संसाधन राज्य की जनता के हैं, लेकिन सरकार इन्हीं संसाधनों से जुड़े सवालों के बीच निजी कंपनी से 25 साल तक महंगी बिजली खरीदने जा रही है। धामी कैबिनेट के अदाणी पावर से 1320 मेगावाट बिजली ₹5.746 प्रति यूनिट की दर से 25 वर्षों तक खरीदने के फैसले पर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार को घेरते हुए पूछा है, “नदियां हमारी, जल हमारा, संसाधन हमारे; फिर 25 साल तक अदाणी से बिजली क्यों और वह भी इस दर पर क्यों?”
आर्य ने कहा कि यह महज बिजली खरीद का फैसला नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का सवाल है। सरकार को प्रदेश की जनता के सामने इस करार का पूरा हिसाब रखना चाहिए। उन्होंने पूछा कि 25 वर्षों में राज्य पर कुल कितनी वित्तीय देनदारी आएगी, ₹5.746 प्रति यूनिट की दर में कौन-कौन से शुल्क और समायोजन शामिल हैं और भविष्य में इस कीमत में बढ़ोतरी या अतिरिक्त वित्तीय भार की क्या गुंजाइश है।
‘कोयला भी हमारा, बिजली भी हमसे खरीदी जाएगी’
नेता प्रतिपक्ष ने इस करार के संदर्भ में एक और गंभीर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, जिस कोयला ब्लॉक से अदाणी के कोयला निकालने की बात है, उसका आवंटन पिछले वर्ष राज्य सरकार को किया गया था। ऐसे में आर्य का सवाल है कि यदि कोयला राज्य की संपत्ति से निकलता है, उसी कोयले से बिजली तैयार होती है और फिर वही बिजली उत्तराखंड को खरीदनी पड़ती है, तो इस पूरी व्यवस्था में वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है और आर्थिक बोझ किस पर पड़ रहा है?
आर्य ने इसे सवालिया अंदाज में कहा, “कोयला हमारा, उसका इस्तेमाल करके बिजली बनेगी, बिजली भी हम ही खरीदेंगे और अंत में उसी बिजली की कीमत भी उत्तराखंड की जनता ही चुकाएगी। सरकार बताए कि इस व्यवस्था में प्रदेश के हिस्से में क्या आया?”
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड ने देश को ऊर्जा देने के लिए अपनी नदियों, पहाड़ों और पर्यावरण की भारी कीमत चुकाई है। जलविद्युत परियोजनाओं के कारण विस्थापन हुआ, पर्यावरणीय प्रभाव झेलने पड़े और प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों के लिए किया गया। ऐसे में यह सवाल जायज है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड अपनी ही ऊर्जा जरूरतों के लिए लगातार बाहर से बिजली खरीदने को क्यों मजबूर है।
25 साल का करार, सरकार दे पूरा हिसाब
आर्य ने कहा कि 25 साल का बिजली खरीद समझौता कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह राज्य की वित्तीय स्थिति, बिजली उपभोक्ताओं और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला दीर्घकालिक फैसला है। इसलिए सरकार को करार की सभी महत्वपूर्ण शर्तें सार्वजनिक करनी चाहिए।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार से पूछा—
* 25 वर्षों में इस समझौते की अनुमानित कुल वित्तीय लागत कितनी होगी?
* ₹5.746 प्रति यूनिट की दर में कौन-कौन से शुल्क और समायोजन शामिल हैं?
* क्या भविष्य में टैरिफ बढ़ने अथवा राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने की संभावना है?
* करार समाप्त करने अथवा उसकी शर्तों के पुनरीक्षण की क्या व्यवस्था है?
* उत्तराखंड की अपनी जलविद्युत क्षमता का वर्तमान में कितना उपयोग हो रहा है?
* राज्य को हर वर्ष बाहर से कितनी बिजली खरीदनी पड़ती है?
* अपनी जलविद्युत और अन्य अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से भविष्य की मांग पूरी करने का सरकार का क्या रोडमैप है?
* कोयला आधारित बिजली खरीद के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किस आधार पर किया गया है?
* इस करार का उपभोक्ताओं और राज्य के खजाने पर वास्तविक वित्तीय प्रभाव क्या होगा?
‘अपनी नदियां, फिर भी बाहर से बिजली क्यों?’
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड के पास जलविद्युत के साथ सौर और अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं। पूरी दुनिया स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील हिमालयी राज्य को 25 वर्षों के लिए कोयला आधारित बिजली पर निर्भर करने की नीति पर सरकार को जवाब देना होगा।
उन्होंने कहा कि सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य की अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है और उत्तराखंड को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बाहर से बिजली खरीदने की नौबत क्यों आ रही है।
आर्य ने कहा कि उत्तराखंड ने अपनी नदियों और प्राकृतिक संसाधनों की कीमत चुकाकर देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी की हैं। अब समय है कि सरकार बताए कि इन संसाधनों का सबसे बड़ा लाभ उत्तराखंड की जनता को कैसे मिलेगा।
उन्होंने कहा कि धामी सरकार को अदाणी पावर के साथ 25 वर्ष के इस करार पर प्रदेश की जनता को “पूरा सच और पूरा हिसाब” देना होगा। सरकार को यह बताना होगा कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि 1,320 मेगावाट बिजली के लिए 25 वर्षों का करार करना पड़ा और इसकी अंतिम कीमत उत्तराखंड के उपभोक्ताओं तथा राज्य के खजाने को कितनी चुकानी होगी।





