

देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होने के साथ कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक होने के दावों पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी हाईकमान की आपत्ति के बावजूद यात्रा का आगे बढ़ना इस खींचतान को सार्वजनिक कर चुका है।
कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी और एआईसीसी महासचिव कुमारी सैलजा ने 1 अक्टूबर को हरीश रावत को पत्र लिखकर यात्रा पर आपत्ति जताई थी। सैलजा के मुताबिक इस कार्यक्रम पर न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल से चर्चा की गई थी। उन्होंने चुनाव नजदीक होने का हवाला देते हुए कहा था कि इस समय पार्टी को एकजुट होकर काम करने की जरूरत है और कोई भी समानांतर कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होगा। लेकिन रावत ने यात्रा रोकने के बजाय सोमवार को जसपुर से हल्द्वानी के लिए कूच कर दिया। यात्रा की शुरुआत सुबह करीब 11:30 बजे जसपुर से हुई और इसके काशीपुर, रामनगर तथा कालाढूंगी होते हुए हल्द्वानी पहुंचने का कार्यक्रम बताया गया है।
रावत ने यात्रा से पहले सोशल मीडिया पर भी अपना रुख साफ किया। उन्होंने लिखा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए उनका संकल्प दृढ़ है और इस दौर में ‘अब रुकना नहीं है’। उन्होंने कांग्रेस को वापस लाने और राज्य में बदलाव की बात भी कही।
मंगलौर से शुरू हुई चर्चा, अब पहुंची हाईकमान तक
हरीश रावत के हालिया उत्तराखंड दौरे की शुरुआत से ही उनके बयानों ने कांग्रेस के भीतर राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है। मंगलौर में बदलाव को लेकर उनके बयान के बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग तरह की व्याख्याएं सामने आईं। इसके बाद रावत ने अपने बयानों को पूरे उत्तराखंड में बदलाव के व्यापक संदर्भ में रखा।अब उनकी यात्रा को लेकर सीधे एआईसीसी स्तर से आपत्ति सामने आना इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग राजनीतिक आयाम देता है।
दरअसल, पूर्व सीएम रावत की यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की चिंता केवल मौजूदा कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव से पहले कांग्रेस की एकजुट छवि को लेकर भी है। पार्टी के भीतर यह चिंता है कि अलग से चल रहा ऐसा कार्यक्रम जनता के बीच कांग्रेस के अंदर विभाजन का संदेश दे सकता है और पिछले कुछ महीनों में प्रभारी कुमारी सैलजा की एक ही रणनीति और कोशिश रही है कि तमाम नेता समानांतर कार्यक्रम चलाने के बजाय पीसीसी या दिल्ली नेतृत्व द्वारा जारी कार्यक्रमों में ही शामिल हों ताकि एकजुटता का संदेश दिया जा सके।

‘अब रुकना नहीं’ बनाम ‘समानांतर कार्यक्रम स्वीकार्य नहीं’
दरअसल कांग्रेस के भीतर हरदा की यात्रा से उपजे इस विवाद की जड़ में यही सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न विद्यमान है। एक तरफ प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा का पत्र है, जिसमें संगठन के साथ समन्वय और चुनाव से पहले एकजुटता पर जोर दिया गया है। दूसरी तरफ रावत हैं, जो यात्रा को जनता से संवाद और कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद बता रहे हैं और उसे रोकने के मूड में दिखाई नहीं दे रहे हैं।
ज़ाहिर है ताजा विवाद सिर्फ धन्यवाद एवं जन संवाद यात्रा कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है। असल में बड़ा सवाल यह बन गया है कि चुनावी तैयारी के समय कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों की कमान किस ढांचे के तहत चलेगी? प्रदेश संगठन के तय कार्यक्रमों से चुनावी व्यूह रचना तैयार होगी या फिर वरिष्ठ नेताओं के स्वतंत्र व्यक्तिगत जनसंपर्क अभियानों से? खुद कांग्रेस के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि पार्टी इमेज बिल्डिंग जरूरी है कि व्यक्तिगत इमेज बिल्डिंग रणनीति से चुनावी कामयाबी हासिल हो पाएगी।
जसपुर से हल्द्वानी तक क्या संदेश?
सोमवार की यात्रा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें कांग्रेस के विभिन्न नेताओं की मौजूदगी को लेकर राजनीतिक हलकों में नजरें लगी हुई हैं। जसपुर में स्थानीय विधायक आदेश सिंह चौहान के साथ उत्तराखंड कांग्रेस कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व विधायक हेमेश खर्कवाल समेत कई नेता हरदा के साथ यात्रा में दिखाई दिए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि हल्द्वानी में स्थानीय विधायक सुमित हृदयेश और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की मौजूदगी भी हरदा की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा में दिखाई दे सकती है। शाम तक तस्वीर साफ हो जाएगी।
यदि अलग-अलग संगठनात्मक भूमिकाओं वाले नेता इस यात्रा में मंच या कार्यक्रम के स्तर पर साथ दिखाई देते हैं, तो इससे एक सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या यह सिर्फ हरीश रावत का व्यक्तिगत जनसंवाद कार्यक्रम है या कांग्रेस के भीतर इसका राजनीतिक दायरा इससे बड़ा है? हालांकि इन नेताओं की मौजूदगी को लेकर अंतिम तस्वीर कार्यक्रम के दौरान और पार्टी नेताओं के आधिकारिक बयानों से ही स्पष्ट होगी कि वे किस भूमिका में इस यात्रा का हिस्सा बनें।
पहले ED का दबाव, फिर राजनीतिक सक्रियता
हरदा की मौजूदा सक्रियता ऐसे समय में बढ़ी है जब वह हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय की जांच से जुड़े घटनाक्रम के कारण भी सुर्खियों में रहे हैं। सितंबर में ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत कई ठिकानों पर तलाशी ली थी। रावत के पूर्व ओएसडी और वर्तमान पीए चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसर से 32 लाख रुपये की नकदी, करीब 200.5 ग्राम सोना और 12 लग्जरी घड़ियां बरामद होने की बात ईडी ने कही थी। एजेंसी के अनुसार जब्त/फ्रीज की गई संपत्तियों का मूल्य करीब 1.28 करोड़ रुपये था, जिसमें क़ीमती घड़ियों का मूल्य शामिल नहीं था।
ईडी के छापे के बाद पूर्व सीएम हरीश रावत ने कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के अभियान की धार कुंद न पड़े। इस दौरान रावत ने ईडी की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक सवाल भी उठाए थे।
असल सवाल 2027 से पहले कांग्रेस की एकजुटता का क्या हुआ ?
जैसा कि आप बखूबी जानते हैं कि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव फरवरी 2027 में प्रस्तावित हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस 19 सीटों पर रही थी। उससे पहले 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की परफॉरमेंस और भी ख़राब रही थी और पार्टी सत्ता गंवाकर केवल 11 सीटों के अपने अब तक के न्यूनतम स्कोर पर सिमट गई थी।
ऐसे में 2027 में कांग्रेस के सामने चुनावी चुनौती केवल सरकार के खिलाफ मुद्दे खड़े करने की नहीं है बल्कि अपने संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व के बीच समन्वय का संदेश देने की भी है ताकि वह 2014 से चले आ रहे हार के चले आ रहे हार के सिलसिले को तोड़ने की कोशिश करती दिखाई दे।
यहीं से ‘ऑल इज वेल’ का सवाल पैदा होता है।
अगर पहाड़ प्रदेश में कांग्रेस पार्टी एकजुट है तो प्रदेश प्रभारी को किसी वरिष्ठ नेता को समानांतर कार्यक्रम न करने की लिखित सलाह क्यों देनी पड़ी? और अगर रावत की यात्रा कांग्रेस को मजबूत करने के लिए है, जैसा कि उनके समर्थकों का कहना है, तो फिर संगठन के शीर्ष स्तर पर इसे लेकर असहमति क्यों सामने आई? इन दोनों सवालों का जवाब फिलहाल कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नजरिए से दिया जा रहा है।
रावत की यात्रा ने खोल दिया बड़ा राजनीतिक सवाल
जहां एक तरफ, हरीश रावत की सक्रियता को उनके समर्थक कांग्रेस को मजबूत करने और जनता से सीधे संवाद की कोशिश बता रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व की चिंता यह है कि संगठन से अलग चलने वाले कार्यक्रम चुनाव से पहले कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल खड़े कर सकते हैं। फिलहाल तस्वीर दो समानांतर धाराओं की है, हरीश रावत की जनसंवाद यात्रा और कांग्रेस संगठन की चुनावी रणनीति।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों धाराएं साथ चलती हैं, उनके बीच समन्वय बनता है या फिर हाईकमान और रावत के बीच सीधे संवाद के जरिए इस विवाद का रास्ता निकाला जाता है।आख़िर उत्तराखंड कांग्रेस के लिए 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा के खिलाफ मुकाबला नहीं है बल्कि चुनाव से पहले पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और सामूहिक रणनीति का सवाल भी उतना ही स्पष्ट और अहम हो चुका है।
इस सब के बीच देखना यह भी दिलचस्प होगा कि क्या, जैसा कि खबरों में दावा किया जा रहा है, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल से मुलाकात जल्द होने वाली है क्योंकि ऐसी किसी मुलाक़ात के बाद ही उत्तराखंड चुनाव में कांग्रेस की तस्वीर कैसी रहेगी इसकी भनक लग पाएगी। इंतज़ार कीजिए तब तक हरदा भी धन्यवाद एवं जन संवाद यात्रा करके लौट रहे होंगे !




