
पवन लालचंद। ट्रेंडिंग अड्डा।
देहरादून। उत्तराखंड बनने के बाद दो दशकों तक एक राजनीतिक मिथक कायम रहा कि भाजपा हो या कांग्रेस सत्ता में आने-जाने का सिलसिला चलता रहेगा लेकिन मुख्यमंत्री कोई भी बने वह टिकाऊ नहीं होगा। नौ नवंबर 2000 से चार जुलाई 2021 तक राज्य ने दस मुख्यमंत्री देखे। केवल नारायण दत्त तिवारी इकलौते मुख्यमंत्री रहे जो अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सके। यानी औसतन एक मुख्यमंत्री दो-सवा दो साल में ही कुर्सी पर काबिज रह पाया। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय लिखने जा रहे हैं। चार जुलाई 2026 को वह अपने पहले और दूसरे कार्यकाल को मिलाकर लगातार पांच साल पूरे करेंगे। इसके साथ ही धामी उत्तराखंड के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का एनडी तिवारी का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ देंगे। इसी के साथ भाजपा के इतिहास में भी वह पहले मुख्यमंत्री होंगे जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
स्वाभाविक है कि यह महज़ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत है, जिसमें मुख्यमंत्री चुनावी नतीजों, संगठनात्मक झगड़ों, गुटीय राजनीति या केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में रखे रिमोट कंट्रोल का बटन दबते ही बदल जाते थे।
जब मुख्यमंत्री बदलना ही राजनीति बन गया था
उत्तराखंड बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी बने, लेकिन अंतरिम सरकार के दौरान ही उन्हें हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को जिम्मेदारी सौंप दी गई। 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई और नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की मजबूत दावेदारों के बावजूद केंद्र-यूपी की राजनीति में कद्दावर रहे तिवारी ने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया और आज तक सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज रहा।
लौट आया अस्थिरता का दौर
2007 में भाजपा सरकार बनी। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद उन्हें हटाकर डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को मुख्यमंत्री बनाया गया। 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अन्ना आंदोलन से उपजे भ्रष्टाचार विरोधी माहौल के बीच निशंक की जगह फिर खंडूरी को कमान सौंपी गई।
2012 में कांग्रेस सत्ता में लौटी तो विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस आलाकमान ने केदारनाथ त्रासदी के बाद हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना दिया।
2017 में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। लेकिन मार्च 2021 में उन्हें हटाकर तीरथ सिंह रावत को जिम्मेदारी दी गई। कुछ ही महीनों बाद भाजपा नेतृत्व ने तीरथ को भी पद छोड़ने को कह दिया और ऐसा लगने लगा कि उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री का लंबे समय तक टिकना शायद असंभव है।
मोदी-शाह का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव
इसी पृष्ठभूमि में चार जुलाई 2021 को भाजपा नेतृत्व ने ऐसा फैसला लिया जिसने सभी को चौंका दिया। संगठन और सरकार में मौजूद कई वरिष्ठ नेताओं के बीच अपेक्षाकृत युवा विधायक पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों ने तब इसे विधानसभा चुनाव तक का अस्थायी प्रयोग बताया। धामी पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके सामने समय भी कम था और चुनौतियाँ भी असाधारण। कोविड की मार, प्रशासनिक असंतोष, चुनावी दबाव और सत्ता विरोधी माहौल, सब कुछ एक साथ था। लेकिन अगले कुछ महीनों में धामी ने लगातार प्रदेश का दौरा किया, संगठन और सरकार के बीच समन्वय बढ़ाया तथा स्वयं को एक सक्रिय मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया। भाजपा नेतृत्व का यह प्रयोग धीरे-धीरे एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति में बदलता दिखाई दिया।
2022: जब हारकर भी जीत गए धामी
उत्तराखंड की राजनीति का निर्णायक मोड़ 2022 का विधानसभा चुनाव बना। भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पहली बार राज्य के इतिहास में लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर दो दशक पुरानी ‘बारी-बारी सत्ता में भागीदारी’ की परंपरा तोड़ दी। हालांकि इस चुनावी लड़ाई में पार्टी की जीत के नायक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। स्वभाविक ही राजनीतिक पंडितों ने मान लिया कि अपनी सीट से चुनावी हार के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक भविष्य पर बड़ा सा ब्रेक लगने जा रहा है लेकिन भाजपा नेतृत्व ने सरकार की जीत का श्रेय धामी के नेतृत्व को दिया और उन्हीं को दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा संदेश दे दिया। बाद में चंपावत उपचुनाव में प्रचंड जीत हासिल कर धामी ने विधानसभा में वापसी की।
दरअसल यहीं से शुरू हुआ वह दौर, जिसे भाजपा और मुख्यमंत्री समर्थक ‘धामी मॉडल’ के नाम से पहचानने लगे।
क्या है ‘धामी मॉडल’?
पाँच सालों में धामी सरकार की पहचान कुछ बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों से बनी। युवाओं के बीच सबसे अधिक चर्चा नकल विरोधी कानून की रही। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल के मामलों पर कठोर कानून बनाकर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि भर्ती प्रक्रिया से समझौता नहीं होगा। आज जब मुख्यमंत्री के रूप में धामी पांच साल पूरे कर रहे हैं, तब उनके पास युवाओं के बीच जाकर यह कहने का साहस है कि उनके दौर में नकल पर प्रभावी अंकुश लगा है। शायद तभी मुख्यमंत्री हर मंच से यह बताना नहीं भूलते हैं कि 33 हज़ार युवाओं को पारदर्शी तरीके से सरकारी नौकरियां मिली हैं। उनके इस आंकड़े में हर पखवाड़े कुछ और नंबर जुड़ जाते हैं।
यूसीसी: गंगोत्री से गंगासागर तक संदेश
इतना ही नहीं, उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया। आज इसका असर यह दिखाई दे रहा है कि गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा सरकारें यूसीसी पर धामी मॉडल फॉलो कर रही हैं। इस दौरान धर्मांतरण विरोधी कानून को और कठोर बनाया गया। सरकारी भूमि तथा अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई ने सरकार की कानून-व्यवस्था संबंधी छवि को मजबूत किया।
विकास के मोर्चे पर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, जी-20, राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन, ऑल वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना और सीमांत क्षेत्रों के विकास जैसे मुद्दों को सरकार ने प्राथमिकता दी।
महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण तथा होमस्टे जैसी योजनाओं को भी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
सिल्क्यारा संकट में दिखी नेतृत्व क्षमता
नवंबर 2023 में उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग में 41 मजदूरों के फंसने की घटना पूरे देश के लिए चिंता का विषय बन गई थी। मुख्यमंत्री धामी ने स्वयं घटनास्थल पर डेरा डाला और बचाव अभियान की लगातार निगरानी की। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद से चले लंबे अभियान के सफल समापन ने उनकी संकट प्रबंधन क्षमता को भी नई पहचान दी।
फर्स्ट रिस्पांडर इमेज
बीते कुछ वर्षों में उत्तराखंड के जिस भी दूरस्थ क्षेत्र में भारी बारिश, बादल फटने या भूस्खलन के चलते आपदा आई तो दिन देखा न रात, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी फर्स्ट रिस्पांडर के रूप में सबसे पहले फ्रंटलाइन पर पहुंचे और आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों में नई प्रशासनिक तेजी देखने को मिली। यह केदारघाटी में दिखा तो चमोली और उत्तरकाशी के धराली में भी।
स्थायित्व का नया राजनीतिक सूत्र
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि धामी की सबसे बड़ी कामयाबी यह नहीं है कि उन्होंने नई नीतियां, कानून या योजनाओं को ही अमलीजामा पहनाया है। असल में उन्होंने न केवल संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखा, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास भी लगातार हासिल किया है और जब-जब कोई भी बड़ा राजनीतिक बखेड़ा खड़ा हुआ तो उसके सियासी सूनामी में तब्दील होने से पहले काबू पा लिया। पार्किंग विवाद के कारण शुरू हुआ निहंग सिखों का प्रकरण भी धामी ने बड़ी ही सूझबूझ के साथ सुलझा लिया है।
आज विपक्ष के खेमे से भी कौन-कौन धामी के मुरीद हैं, इसका अंदाजा राजनीतिक गलियारों में खूब लगाया जाता है। कुल मिलाकर युवा नेतृत्व की छवि, प्रशासनिक सक्रियता और चुनावी सफलता, इन तीनों ने मिलकर पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड भाजपा का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना दिया है।

अब नजर अगले रिकॉर्ड पर
पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड भाजपा के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं और चार जुलाई के बाद वह, नारायण दत्त तिवारी का सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ देंगे। अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उनके नेतृत्व में फिर सत्ता में लौटती है, तो धामी लगातार तीसरी बार भाजपा सरकार बनाने वाले उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं।
बहरहाल, पांच वर्षों की यह यात्रा केवल एक राजनेता के राजनीतिक रिकॉर्ड की कहानी नहीं है। यह उस उत्तराखंड की भी कहानी है, जिसने लंबे समय तक नेतृत्व की अस्थिरता देखी और अब पहली बार स्थायित्व को अपनी नई राजनीतिक पहचान बनते देख रहा है। किसी भी युवा राज्य के लिए नेतृत्व के स्तर पर स्थिरता विकास की उसकी रफ्तार के लिए बेहद जरूरी है। दो दशक बाद ही सही लेकिन अब उत्तराखंड भी राजनीतिक स्थायित्व के उस एक्सप्रेसवे पर आ गया है जहां से पीछे मुड़कर देखना शायद अब गंवारा हो!

26 साल में 11 मुख्यमंत्री:
कब-कब बदली सत्ता की कमान?
* 2000 – नित्यानंद स्वामी
* 2001 – भगत सिंह कोश्यारी
* 2002–2007 – एन.डी. तिवारी
* 2007–2009 – भुवन चंद्र खंडूरी
* 2009–2011 – रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
* 2011–2012 – भुवन चंद्र खंडूरी
* 2012–2014 – विजय बहुगुणा
* 2014–2017 – हरीश रावत
* 2017–2021 – त्रिवेंद्र सिंह रावत
* 2021 – तीरथ सिंह रावत
* 4 जुलाई 2021 से अब तक – पुष्कर सिंह धामी

आखिर क्यों टिके रहे धामी?
* संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखना।
* केंद्रीय नेतृत्व का लगातार विश्वास बनाए रखना।
* विवादों को बड़े सियासी संकट में तब्दील होने से पहले संभाल लेना।
* युवा नेतृत्व के साथ अपेक्षाकृत कम टकराव वाली कार्यशैली।
* समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून
* नए निवेश के लिए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, नीतियों में फेरबदल।
* सरकारी नौकरियों के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया तैयार करना।
* 2022 में भाजपा को लगातार दूसरी बार सत्ता में लाकर दिखाई राजनीतिक क्षमता।
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धामी राज के पांच साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री द्वारा उत्तराखंडवासियों को लिखी चिट्ठी यहां पढ़िए हुबहू:

प्रिय प्रदेशवासियों,
आप सभी के स्नेह, विश्वास और आशीर्वाद से मुख्यसेवक के रूप में जनसेवा के पाँच वर्ष पूर्ण हुए हैं। सेवा, सुशासन और जनकल्याण की यह यात्रा 1.25 करोड़ उत्तराखंडवासियों के विश्वास, आकांक्षाओं और सहयोग को समर्पित है।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन और डबल इंजन सरकार के संकल्प के साथ इन पाँच वर्षों में हमने विकास और सांस्कृतिक अस्मिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए। समान नागरिक संहिता (UCC), सशक्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, सशक्त भू-कानून तथा देश में नई मिसाल कायम करते हुए मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन जैसे ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। इन कदमों ने उत्तराखंड को सुशासन, समानता और पारदर्शी व्यवस्था की दिशा में अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित किया। युवाओं के लिए पारदर्शी भर्ती व्यवस्था, मातृशक्ति को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, निवेश, रोजगार, बेहतर कनेक्टिविटी तथा चारधाम सहित धार्मिक एवं पर्यटन अवसंरचना के व्यापक विकास को नई गति मिली।
पूर्ण पारदर्शिता के साथ 34 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी सेवाओं में अवसर प्रदान किए गए। सैनिकों, किसानों, युवाओं और मातृशक्ति के सशक्तिकरण के लिए अनेक जनहितकारी निर्णय लिए गए। सौर ऊर्जा, होमस्टे और स्वरोजगार को नई ऊर्जा मिली तथा रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आगमन से पर्यटन एवं स्थानीय अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती मिली। ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिली, राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन, ₹1 लाख करोड़ से अधिक निवेश की ग्राउंडिंग तथा सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में उत्तराखंड के उत्कृष्ट प्रदर्शन ने विकास के नए आयाम स्थापित किए है।
इसी जनसेवा के संकल्प को और अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से आज से “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” अभियान के दूसरे चरण का शुभारंभ भी किया जा रहा है। इस अभियान के माध्यम से सरकार स्वयं जनता के बीच पहुँचकर जनसमस्याओं के समाधान, जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर तक पहुँचाने तथा सेवा और सुशासन की भावना को और अधिक सुदृढ़ करने का कार्य करेगी।
विकसित उत्तराखंड – विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर आपके विश्वास, सहयोग और सहभागिता के साथ हम जनसेवा, सुशासन और समृद्धि की इस यात्रा को और अधिक गति और नई ऊँचाइयाँ प्रदान करने के लिए निरंतर संकल्पबद्ध हैं।
आपका विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति है।
जय हिंद!
जय उत्तराखंड!



