
- कभी दुनिया में अपनी खुशबू के लिए मशहूर रही दून बासमती अब पुनर्जीवन की राह पर है। सफल ट्रायल के बाद 160 किसानों ने 75 हेक्टेयर में रोपाई शुरू कर दी है। प्रशासन का फोकस अब खेती बढ़ाने के साथ ब्रांडिंग, सीड बैंक और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर है।

Doon Basmati Revival news: एक समय था जब दुनिया भर में “दून बासमती” की खुशबू देहरादून की पहचान थी।
फिर शहरीकरण बढ़ा…खेती घटती गई…
और दून बासमती लगभग गायब होने लगी।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
उत्तराखंड सरकार, दून जिला प्रशासन और किसानों की साझी कोशिशों से दून बासमती एक बार फिर खेतों में लौट रही है।
देहरादून की पहचान रही दून बासमती अब एक बार फिर वापसी करती दिखाई दे रही है। वर्ष 2025 में हुए सफल ट्रायल के बाद इस बार इसकी खेती का दायरा बढ़ाकर 75 हेक्टेयर कर दिया गया है। जिले के करीब 160 किसान इसकी रोपाई में जुट गए हैं।
जिला प्रशासन का दावा है कि यह केवल खेती बढ़ाने का अभियान नहीं बल्कि दून बासमती की ऐतिहासिक पहचान को वापस लाने की कोशिश है।
आखिर क्यों खास है दून बासमती?
दून घाटी की मिट्टी और जलवायु में उगने वाली इस बासमती की खुशबू और स्वाद इसे सामान्य बासमती से अलग बनाते हैं।
कभी यह चावल विदेशों तक निर्यात होता था और देहरादून का नाम दुनिया भर में इसी से पहचाना जाता था।
लेकिन उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद देहरादून के राजधानी बनने के बाद तेजी से हुए शहरी विस्तार, खेती योग्य जमीन कम होने और किसानों के दूसरी फसलों की ओर जाने से इसका रकबा लगातार घटता चला गया।
550 हेक्टेयर से घटकर रह गई 150 हेक्टेयर
कृषि विभाग के अनुसार एक समय दून बासमती लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती थी।
आज यह घटकर लगभग 150-200 हेक्टेयर तक सिमट चुकी है।
यही वजह है कि प्रशासन ने इसके पुनर्जीवन को मिशन मोड में लिया है।
पिछले साल का ट्रायल क्यों बना गेम चेंजर?
2025 में लगभग 65 हेक्टेयर में ट्रायल किया गया।
100 से अधिक किसानों ने खेती की।
परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे।
इतना ही नहीं—
प्रशासन ने किसानों से 200 क्विंटल से अधिक धान ₹65 प्रति किलोग्राम की दर से सीधे खरीदा।
करीब ₹13 लाख की राशि सीधे किसानों के खातों में भेजी गई।
यहीं से किसानों का भरोसा लौटा।
अब क्या होगा?
प्रशासन ने इस बार कई बड़े कदम उठाए हैं—
* 75 हेक्टेयर में खेती
* 160 किसान जुड़े
* विकासनगर में सीड बैंक
* बीज संरक्षण
* वैज्ञानिक टेस्टिंग
* ब्रांडिंग
* किसानों से सीधी खरीद
* मार्केटिंग के लिए रीप और हिलांस की मदद
किसानों को क्या फायदा होगा?
यदि ब्रांडिंग सफल रही तो किसानों को सामान्य धान की तुलना में अधिक कीमत मिल सकती है। प्रशासन का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि “दून बासमती” को एक प्रीमियम ब्रांड बनाना है।
क्या फिर दुनिया में महकेगी दून बासमती?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक परीक्षण, GI पहचान का प्रभावी उपयोग, मजबूत ब्रांडिंग और निर्यात बाजार पर समानांतर काम हुआ तो आने वाले वर्षों में दून बासमती फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना सकती है।
हालांकि चुनौती भी कम नहीं है। तेजी से हो रहा शहरीकरण, खेती की घटती जमीन और किसानों को लगातार बेहतर दाम दिलाना इस अभियान की असली परीक्षा होगी।
पिछले वर्ष के ट्रायल के उत्साहजनक परिणामों के बाद इस वर्ष खेती का दायरा बढ़ाया गया है। हमारा लक्ष्य दून बासमती को उसकी विशिष्ट सुगंध, गुणवत्ता और स्थानीय पहचान के साथ एक मजबूत ब्रांड बनाना है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार और अधिक आय मिल सके।— डॉ. आशीष चौहान, जिलाधिकारी देहरादून
हमारा फोकस उत्पादन के साथ-साथ मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर भी है, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
— अभिनव शाह, मुख्य विकास अधिकारी
क्यों खत्म होने लगी थी दून बासमती?
* कभी 550 हेक्टेयर में होती थी खेती
* अब 150–200 हेक्टेयर तक सिमट गई
* शहरीकरण और निर्माण कार्यों से कृषि भूमि घटी
* किसानों ने दूसरी फसलों की ओर रुख किया
किसान की आवाज
हरबर्टपुर के किसान सूर्य प्रकाश बहुगुणा कहते हैं कि प्रशासन के सहयोग से किसानों का भरोसा बढ़ा है। यदि इसी तरह बाजार और उचित मूल्य मिलता रहा तो आने वाले वर्षों में दून बासमती फिर देहरादून की पहचान बन सकती है।
कह सकते हैं कि दून बासमती का पुनर्जीवन केवल एक कृषि परियोजना नहीं, बल्कि देहरादून की सांस्कृतिक और कृषि विरासत को बचाने की पहल भी है। अगर बीज संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण, प्रभावी ब्रांडिंग और किसानों को लाभकारी बाजार लगातार मिलता रहा, तो आने वाले वर्षों में ‘दून की बासमती’ एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना सकती है।




