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BJP के सबसे सुरक्षित गढ़ में PK का ‘राजनीतिक धमाका’, बांकीपुर जीत के 7 बड़े मायने; क्या बिहार की राजनीति बदलने वाली है?

BJP के गढ़ बांकीपुर में प्रशांत किशोर की बड़ी जीत, बिहार की राजनीति में क्या बदलने वाला है?

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Bankipur By Election: बिहार की सियासत में सोमवार का दिन ब्लॉकबस्टर नतीजे का गवाह बना। कहने को पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को हराकर जन सुराज पार्टी ने विधानसभा में अपना खाता खोल लिया है। लेकिन न बांकीपुर विधानसभा सीट कोई आम सीट है और ना ही प्रशांत किशोर की यहां से हुई जीत किसी बड़े ‘राजनीतिक धमाके’ से कम है। यों बिहार की राजनीति हमेशा से देश को चौंकाती रही है और इस उपचुनाव में भी वह सिलसिला बरकरार रहा है।
1995 से भाजपा का अभेद्य किला मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों से हराकर बड़ी जीत दर्ज की। प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को 44,827 वोट प्राप्त हुए। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) उम्मीदवार रेखा कुमारी महज 14,273 वोटों पर सिमटकर तीसरे पायदान पर खिसक गईं।

स्वाभाविक है कि यह उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके नतीजों  ने बिहार की राजनीति के कई स्थापित समीकरणों पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि क्या उपचुनाव नतीजे आने वाले समय में प्रदेश पॉलिटिक्स में बड़ा उलटफेर करने वाले हैं।

जिस तरह से प्रशांत किशोर अपनी जीत और बांकीपुर में भाजपा की हार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ मैंडेट साबित करने में लगे हैं, उसके बाद सवाल यही है कि क्या सीएम सम्राट की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

बांकीपुर के सात सियासी संदेश ? 

1. भाजपा का अभेद्य किला क्यों ढहा?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राज्यसभा पहुंचे नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई बांकीपुर सीट पर वर्ष 1995 से लगातार कमल खिल रहा था। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और उसके बाद उनके पुत्र नितिन नवीन ने इस सीट पर लगातार जीत दर्ज की।  नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार चार विधानसभा चुनावों में जीत का परचम लहराया। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन को लगभग 63 प्रतिशत वोट मिले थे और यह सीट भाजपा की सबसे सुरक्षित शहरी सीटों में गिनी जाती थी।

ऐसे में भाजपा को उम्मीद थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रभाव वाली यह सीट वह बेहद आसानी से जीत लेगी और उम्मीदवार उतारने से लेकर कैंपेन में उसकी यही ठसक दिखती भी रही, लेकिन परिणाम बिल्कुल उलट आया है। लिहाजा यह नितिन नवीन और सीएम सम्राट चौधरी के लिए सियासी आघात से कम नहीं है।

 

2. प्रशांत किशोर को पहली बड़ी राजनीतिक वैधता

चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर के लिए यह जीत बेहद अहम मानी जा रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी जन सुराज पार्टी ने बिहार की सभी 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी। यहां तक कि कई सीटों पर पीके की पार्टी को NOTA से भी कम वोट मिले थे।

ऐसे में भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में मिली जीत ने प्रशांत किशोर को पहली बार एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जो केवल चुनावी रणनीति बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी अखाड़े में उतरकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में शिकस्त भी दे सकते हैं।

 

3. क्या यह भाजपा के लिए चेतावनी ?

बांकीपुर की हार भाजपा के लिए राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक, दोनों स्तर पर झटका मानी जा रही है। जिस सीट पर पार्टी लगातार तीन दशक से जीतती रही हो, वहां उपचुनाव में मिली हार यह संकेत देती है कि पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखना अब उसके लिए पहले जितना आसान नहीं रह गया है। नीट पेपर लीक के बाद जंतर मंतर से पटना सहित देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद आए चुनावी नतीजों ने भाजपा ले कोर वोटर में सेंधमारी के संकेत दे दिए हैं।

हालांकि किसी एक उपचुनाव नतीजे के आधार पर किसी बड़े राजनीतिक निहितार्थ पर पहुँचना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह परिणाम भाजपा को अपने शहरी संगठन और स्थानीय रणनीति की समीक्षा करने के लिए जरूर मजबूर करेगा।

4.  नितिन नवीन की साख पर भी सवाल

इस परिणाम का सबसे अधिक असर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की राजनीतिक साख पर भी पड़ सकता है। बांकीपुर उनकी परंपरागत सीट रही है और राज्यसभा जाने के लिए सीट खाली करने के बाद भाजपा इस सीट को बचा नहीं सकी, यह किसी ‘जोर के झटके’ से कम नहीं है।

स्वाभाविक है कि पटना से लेकर दिल्ली तक विपक्ष बांकीपुर में भाजपा की शिकस्त को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की कमजोर पकड़ के तौर पर पेश करेगा। हालांकि भाजपा इसे महज़ एक उपचुनाव नतीजा बताकर डैमेज कंट्रोल करने कोशिश करेगी।

5. क्या सीएम सम्राट चौधरी पर भी बढ़ेगा दबाव?

राज्य में प्रचंड बहुमत की भाजपा सरकार होने के कारण राजनीतिक जिम्मेदारी का अहम दारोमदार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर भी आएगा। जहां, विपक्ष इस हार को सीएम और उनकी सरकार के प्रदर्शन से जोड़ने का प्रयास करेगा, वहीं भाजपा के भीतर भी सम्राट विरोधी धड़ा अंदरूनी तौर पर इस फ़ेल्योर के लिए उनकी घेराबंदी करने से नहीं चूकेगा। उधर प्रशांत किशोर ने तो इस चुनाव को सम्राट चौधरी के ख़िलाफ रेफरेंडम की तरह पेश कर ही दिया है।

6. सबसे बड़ा नुकसान आरजेडी को?

इस उपचुनाव की एक और बड़ी कहानी आरजेडी का तीसरे पायदान पर खिसक जाना भी है। बिहार में भाजपा विरोधी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले तेजस्वी यादव के लिए उपचुनाव परिणाम कई सवाल छोड़ गया है।

यदि विपक्षी वोटों का एक हिस्सा जन सुराज की ओर स्थानांतरित हो रहा है, तो आगे लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आरजेडी के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की चुनौती और बड़ी हो सकती है। विधानसभा में प्रशांत किशोर की मौजूदगी तेजस्वी यादव के लिए कितना सहज और असहज रहने वाली है इसकी कल्पना अभी से की जा सकती है।

 

7.  क्या बिहार में तीसरे विकल्प की शुरुआत?

प्रशांत किशोर लंबे समय से बिहार में एक वैकल्पिक और नई राजनीति की बात करते रहे हैं। बांकीपुर की जीत ने उनके इस दावे को नई ताकत दी है। संभव है कि अब वे सदन और सड़क, दोनों मोर्चों पर वैकल्पिक नई राजनीति की पुरजोर वकालत करेंगे और आरजेडी को इससे जूझना होगा।

हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बिहार की राजनीति पूरी तरह त्रिकोणीय हो जाएगी। लेकिन इतना जरूर है कि अब जन सुराज को केवल एक प्रयोगात्मक राजनीतिक दल मानना आसान नहीं होगा।

इतना तो तय है कि बिहार की पारंपरिक एनडीए बनाम महागठबंधन की राजनीति में एक नया आयाम प्रशांत किशोर की विधानसभा में एंट्री के बाद जुड़ गया है।

बांकीपुर परिणाम:  आगे क्या?

 

बांकीपुर का परिणाम केवल एक सीट की जीत या हार नहीं है। इसने भाजपा के संगठन, आरजेडी के विपक्षी नेतृत्व और प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता, तीनों पर नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह जीत सिर्फ एक उपचुनाव तक सीमित रहती है या फिर आगे हम मानने को मजबूर होंगे कि बिहार की राजनीति का एक नया अध्याय बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के बहाने करवट ले चुका है।

 

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