
- उत्तराखंड में 1,320 MW बिजली खरीद पर कांग्रेस के सवाल, सरकार ने दी सफाई; जानिए पूरा मामला
देहरादून: उत्तराखंड में 1,320 मेगावाट बिजली की लॉन्ग टर्म खरीद को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने धामी सरकार की टेंडर प्रक्रिया और बिजली खरीद के मॉडल पर कई सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि पहले राज्य की सरकारी कंपनियों के जरिए 1,320 MW का थर्मल पावर प्रोजेक्ट लगाने की तैयारी की गई थी, लेकिन कुछ ही महीनों बाद इस मॉडल को बदल दिया गया।

इसके बाद उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) ने 1,320 MW बिजली की दीर्घकालिक खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की। खेड़ा ने दावा किया कि टेंडर की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। कांग्रेस ने इन बदलावों, एक ही बिडर से पूरी बिजली लेने की व्यवस्था, फिक्स्ड चार्ज और 25 साल के संभावित वित्तीय दायित्व को लेकर सवाल उठाए हैं।
सरकार ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा है कि टेंडर की शर्तों में बदलाव कंपनियों से मिले सुझावों के तकनीकी परीक्षण के बाद किए गए और जरूरी बदलावों को उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) की मंजूरी मिली। सरकार के मुताबिक शुरुआती चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई हैं।
पहले सरकारी कंपनियों के जरिए प्लांट लगाने की थी योजना
कांग्रेस के मुताबिक, 2024 में राज्य की भविष्य की बिजली जरूरतों को देखते हुए 1,320 MW क्षमता का थर्मल पावर प्लांट लगाने की योजना पर काम हुआ था। इसके लिए उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) और THDC India Limited के बीच संयुक्त उपक्रम (JV) बनाने का प्रस्ताव था।
इस मॉडल का उद्देश्य राज्य को लंबे समय तक लगातार बिजली उपलब्ध कराना था। इसके लिए कोयले की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार से भी संपर्क किया गया था।
यानी शुरुआती योजना यह थी कि राज्य की सरकारी कंपनियां मिलकर पावर प्रोजेक्ट तैयार करें और वहां से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल उत्तराखंड की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाए।
करीब छह महीने बाद मॉडल बदलने पर कांग्रेस का सवाल
पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि जिस प्रोजेक्ट को सरकारी कंपनियों के जरिए आगे बढ़ाने की तैयारी थी, उसे कुछ ही महीनों में क्यों बदल दिया गया।
कांग्रेस के मुताबिक, जुलाई 2024 में कोयले की आपूर्ति से संबंधित मंजूरी मिलने के बाद भी 16 जनवरी 2025 की बैठक में PSU के जरिए प्रोजेक्ट आगे बढ़ाने की व्यवहारिकता पर सवाल उठाए गए और JV मॉडल को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया गया।
UPCL की जनवरी 2025 की पावर-प्रोक्योरमेंट रिपोर्ट में भी कहा गया कि प्रस्तावित JV समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने की स्थिति में नहीं होगा। इसके बाद 1,320 MW नई क्षमता के लिए टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) के जरिए बिजली खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई।
रिपोर्ट में लंबे समय की बिजली आपूर्ति 2029-30 से शुरू करने का लक्ष्य बताया गया था।
प्लांट लगाने के बजाय बाहर से बिजली खरीदने का फैसला
JV मॉडल आगे नहीं बढ़ने के बाद राज्य ने 1,320 MW बिजली की दीर्घकालिक खरीद का रास्ता चुना।
इसका मतलब है कि उत्तराखंड को खुद नया थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने के बजाय किसी पावर जनरेशन कंपनी से लंबे समय के अनुबंध के तहत बिजली खरीदनी होगी।
UPCL की रिपोर्ट में 1,320 MW बेस-लोड बिजली को 25 साल की अवधि के लिए खरीदने की सिफारिश की गई थी। इसमें कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए SHakti B(iv) नीति के तहत कोयला आवंटन लेने का भी उल्लेख किया गया था।
कांग्रेस ने टेंडर को लेकर कौन-कौन से सवाल उठाए?
1. 86 में से 84 शर्तों में बदलाव क्यों?
पवन खेड़ा का दावा है कि टेंडर में कुल 86 शर्तें थीं और इनमें से 84 में बदलाव किया गया।
कांग्रेस का सवाल है कि अगर टेंडर जारी होने के बाद इतनी बड़ी संख्या में शर्तों में संशोधन करना पड़ा, तो मूल शर्तें किस आधार पर तय की गई थीं और बाद में बदलाव के सुझाव किस स्तर से आए।
2. पूरी 1,320 MW बिजली एक ही कंपनी से क्यों?
खेड़ा ने टेंडर की उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाया जिसके तहत उनके मुताबिक पूरी 1,320 MW क्षमता एक ही बिडर से ली जा सकती है।
कांग्रेस का तर्क है कि इतनी बड़ी क्षमता को एक ही कंपनी से लेने की व्यवस्था से प्रभावी प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
3. पावर प्लांट उत्तराखंड में होना जरूरी क्यों नहीं?
कांग्रेस के मुताबिक टेंडर में बिजली पैदा करने वाला प्लांट उत्तराखंड में होना अनिवार्य नहीं रखा गया है।
इसका अर्थ है कि देश के किसी अन्य हिस्से में स्थित या प्रस्तावित पावर प्लांट से भी उत्तराखंड को बिजली मिल सकती है।
कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि यदि बिजली दूसरे राज्य से आएगी तो उसे उत्तराखंड तक पहुंचाने की ट्रांसमिशन लागत किसके जिम्मे होगी और इसका असर बिजली की अंतिम कीमत पर क्या पड़ेगा।
4. फिक्स्ड चार्ज 70% से 75% क्यों किया गया?
पवन खेड़ा ने टैरिफ स्ट्रक्चर में फिक्स्ड चार्ज को लेकर भी सवाल उठाया है। उनका दावा है कि इसकी सीमा 70% से बढ़ाकर 75% की गई।
सरल शब्दों में, फिक्स्ड चार्ज बिजली उत्पादन संयंत्र की उपलब्धता और क्षमता से जुड़ा भुगतान होता है। इसलिए कांग्रेस ने सवाल उठाया कि बिजली की वास्तविक खपत कम रहने की स्थिति में भी राज्य पर कितना तय भुगतान दायित्व रहेगा।
5. पहली और दूसरी यूनिट की समयसीमा क्या है?
कांग्रेस ने प्रोजेक्ट की समयसीमा में बदलाव को भी मुद्दा बनाया है।
खेड़ा के मुताबिक संशोधित टेंडर में पहली यूनिट के लिए 42 महीने और दूसरी यूनिट के लिए 48 महीने की समयसीमा रखी गई है।
कांग्रेस जानना चाहती है कि इन समयसीमाओं में बदलाव किस आधार पर किया गया और इसका संभावित बोलीदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ा।
25 साल में कितना खर्च हो सकता है?
कांग्रेस ने इस बिजली खरीद के लंबे समय के वित्तीय दायित्व को लेकर भी सवाल उठाया है।
पवन खेड़ा ने करीब ₹5.74 प्रति यूनिट की दर और 25 साल की अवधि के आधार पर अनुमान लगाया है कि 1,320 MW बिजली खरीद का संभावित कुल दायित्व करीब ₹1.66 लाख करोड़ तक हो सकता है।
हालांकि यह एक अनुमानित गणना है। वास्तविक भुगतान अंतिम टैरिफ, प्लांट की उपलब्धता, वास्तविक बिजली आपूर्ति और अनुबंध की अन्य शर्तों पर निर्भर करेगा। यह रकम एकमुश्त भुगतान नहीं होगी, बल्कि अनुबंध की अवधि के दौरान भुगतान किया जाएगा।
धामी सरकार ने कांग्रेस के सवालों का सिलसिलेवार ढंग से क्या जवाब दिया?

1. 86 में से 84 शर्तों में बदलाव क्यों हुआ?
प्रमुख सचिव ऊर्जा डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि जैसा कि दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया गया है कि 84 बदलाव किए गए वह सरासर गलत है, बमुश्किल पाँच से छह बदलाव शर्तों में किए गए। सुंदरम के मुताबिक टेंडर में शामिल कंपनियों की ओर से कुछ शर्तों में बदलाव के सुझाव दिए गए थे।
इन सुझावों का तकनीकी स्तर पर परीक्षण किया गया। जिन बदलावों को आवश्यक पाया गया, उन्हें उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) के सामने रखा गया और मंजूरी मिलने के बाद लागू किया गया।
2. क्या किसी एक कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए बदलाव किए गए?
सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है।
सरकार के मुताबिक RFQ के शुरुआती चरण में 5 कंपनियां योग्य पाई गई हैं। इसके बाद इन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धी बोली होगी और अंतिम चयन कुल टैरिफ के आधार पर किया जाएगा।
3. प्लांट उत्तराखंड में ही क्यों नहीं लगाया जा रहा?
सरकार का कहना है कि थर्मल पावर प्लांट में बड़ी मात्रा में कोयले की जरूरत होती है। इसलिए कंपनी को देश में किसी भी उपयुक्त स्थान पर प्लांट लगाने का विकल्प दिया गया है।
सरकार के अनुसार उत्तराखंड में प्लांट लगाने पर भी कोई रोक नहीं है।
4. दूसरे राज्य से बिजली आने पर ट्रांसमिशन लागत कौन देगा?
सरकार के मुताबिक ट्रांसमिशन लागत का निर्धारण टेंडर और बिजली की दर से संबंधित शर्तों के आधार पर होगा।
सरकार का कहना है कि अभी यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि दूसरे राज्य से बिजली लाने की पूरी अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं को ही वहन करनी पड़ेगी।
5. फिक्स्ड चार्ज 70% से 75% क्यों किया गया?
प्रमुख सचिव के अनुसार कंपनियों की लागत और ईंधन की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया।
सरकार का कहना है कि फिक्स्ड चार्ज बढ़ने का मतलब अपने आप बिजली की अंतिम कीमत बढ़ना नहीं है। अंतिम टैरिफ फिक्स्ड चार्ज और ईंधन लागत समेत अन्य घटकों से तय होगा।
सरकार के अनुसार इस बदलाव को UERC की मंजूरी भी मिली है।
6. 25 साल में ₹1.60–1.66 लाख करोड़ का खर्च क्यों?
सरकार का कहना है कि यह राशि 25 साल में संभावित कुल भुगतान का अनुमान है, न कि एकमुश्त खर्च।
वास्तविक भुगतान अंतिम बिजली दर और अनुबंध के तहत वास्तव में कितनी बिजली खरीदी जाती है, इस पर निर्भर करेगा।
7. सरकारी कंपनियों के जरिए प्लांट लगाने की योजना क्यों छोड़ी गई?
सरकार के मुताबिक UJVNL और THDC के संयुक्त उपक्रम के जरिए पावर प्लांट लगाने के विकल्प पर विचार किया गया था, लेकिन यह JV आगे नहीं बढ़ सका।
इसके बाद राज्य की भविष्य की बिजली जरूरत को पूरा करने के लिए लंबे समय के लिए बिजली खरीदने का विकल्प चुना गया।
8. क्या टेंडर में प्रतिस्पर्धा है?
सरकार के मुताबिक शुरुआती RFQ चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई हैं। आगे इन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धी बोली होगी।
अंतिम चयन बोली में मिलने वाले कुल टैरिफ के आधार पर किए जाने की बात सरकार ने कही है।
आखिर विवाद किस बात पर है?
पूरे मामले को दो हिस्सों में समझा जा सकता है।
कांग्रेस का सवाल: सरकारी कंपनियों के जरिए 1,320 MW का पावर प्लांट लगाने की योजना से बाहर निकलकर लंबे समय के लिए बिजली खरीदने का फैसला क्यों लिया गया और टेंडर की बड़ी संख्या में शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार का जवाब: सरकारी कंपनियों का JV आगे नहीं बढ़ सका, इसलिए भविष्य की बिजली जरूरत को देखते हुए टेंडर के जरिए बिजली खरीदने का विकल्प चुना गया। शर्तों में किए गए बदलाव तकनीकी परीक्षण और नियामकीय मंजूरी के बाद किए गए हैं तथा शुरुआती चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई हैं।
फिलहाल 1,320 MW की यह प्रस्तावित बिजली खरीद उत्तराखंड की भविष्य की बेस-लोड जरूरत को पूरा करने के लिए प्रस्तावित लंबे समय के इंतजाम के रूप में सामने आती है। इसकी अंतिम लागत और बिजली की दर प्रतिस्पर्धी बोली तथा अनुबंध की अंतिम शर्तों के बाद स्पष्ट होगी।



