
वक्ताओं ने कहा कि सात मोड़ क्षेत्र हाथियों के लिए महत्वपूर्ण और प्रमुख गलियारा है। यहां बड़े पैमाने पर पेड़ कटान और सड़क निर्माण से हाथियों के आवास और उनके आवागमन के रास्ते प्रभावित होंगे, जिससे आने वाले समय में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने का खतरा है।
‘हाथियों को चारों तरफ से कंक्रीट के जाल में घेरने जैसा’
पर्यावरणविद् हिमांशु अरोड़ा ने प्रेस वार्ता की शुरुआत करते हुए विकास के मौजूदा मॉडल पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “हम लगातार वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। एक तरफ ऋषिकेश सात मोड़ की सड़क को फोरलेन या सिक्सलेन करना और दूसरी तरफ थानों की सड़क का चौड़ीकरण करना—यह हाथियों को चारों तरफ से कंक्रीट के जाल में घेरने जैसा है। अगर हम उनके रहने की जगह और चलने के रास्ते छीन लेंगे, तो जानवर आखिर जाएंगे कहां? मजबूरन वे इंसानी बस्तियों का रुख करेंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगा।”
देहरादून में जंगल कटान के आंकड़ों पर उठाया सवाल
अनूप नौटियाल ने आरटीआई से मिले आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद पिछले 25 वर्षों में प्रदेश के समस्त जंगलों के कटान का 47 प्रतिशत हिस्सा अकेले देहरादून जिले में हुआ है।
उन्होंने कहा, “अगर महज 25 सालों में देहरादून में इतने व्यापक स्तर पर पेड़ों और जंगलों का कटान हुआ है तो आने वाले वर्षों में बचा हुआ जंगल भी पूरी तरह साफ कर दिया जाएगा। इसके बाद देहरादून सिर्फ एक कंक्रीट का जंगल बनकर रह जाएगा।” उन्होंने इस कथित विकास मॉडल को ‘पर्यावरण संहार’ की संज्ञा दी।
‘सात मोड़ हाथियों का प्रमुख गलियारा’
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सड़क निर्माण कार्य शुरू हुआ तो अगले 4-5 वर्षों तक जंगल में निर्माण के कारण पैदा होने वाली अशांति से हाथी और अन्य वन्यजीव अपनी जगह छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।
वक्ताओं ने हाल ही में डोईवाला में हुई घटना का भी हवाला दिया, जहां उनके अनुसार एक-दो दिन पहले हाथी के हमले में एक व्यक्ति की जान चली गई। उनका कहना था कि सात मोड़ पर पेड़ काटे गए तो हाथियों के भटकने के कारण इस तरह की घटनाएं और तेजी से बढ़ सकती हैं।
‘नेपाली फार्म-देहरादून फोरलेन पहले से मौजूद, फिर दूसरा NH-7 क्यों?’’
रात 8 से सुबह 6 बजे तक सात मोड़ पर यातायात बंद करने का सुझाव
सात मोड़ क्षेत्र में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ओमिनी ने वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यह मार्ग वन्यजीवों के लिए बेहद संवेदनशील है और करीब 50 वर्ष पहले ऋषिकेश-देहरादून मार्ग रात के समय बंद किया जाता था।
उन्होंने सुझाव दिया कि आज भी रात 8 बजे से सुबह 6 बजे तक सात मोड़ मार्ग को यातायात के लिए पूरी तरह बंद किया जा सकता है। इस दौरान रात का यातायात नेपाली फार्म-देहरादून फोरलेन सड़क की ओर डायवर्ट किया जा सकता है। उनका कहना था कि इससे वन्यजीवों को रात में सुरक्षित आवाजाही का अवसर मिलेगा।
‘सड़क चौड़ी करने से हादसे नहीं रुकते’
नितिन ने सात मोड़ को खत्म कर सड़क को सीधा करने और इससे दुर्घटनाएं रोकने के सरकारी दावों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली-जयपुर हाईवे और दिल्ली-आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे जैसे नए फोरलेन और सिक्सलेन मार्गों पर भी गंभीर दुर्घटनाएं होती रहती हैं।
उन्होंने कहा, “चौड़े हाईवे बनने से वाहनों की रफ्तार बढ़ती है, जिससे दुर्घटनाएं घटती नहीं बल्कि और अधिक बढ़ जाती हैं।”
अगले एक महीने तक जारी रहेगा आंदोलन
सात मोड़ को बचाने के अभियान के तहत युवाओं ने आगामी एक महीने के कार्यक्रमों की रूपरेखा भी साझा की। 15 अगस्त को सात मोड़ पर विशेष जागरूकता एवं देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यहां से बाइक रैली भी गुजरेगी। रक्षाबंधन पर जंगलों में पेड़ों को रक्षासूत्र बांधकर पेड़ों और जंगलों को बचाने का संकल्प लिया जाएगा।
9 सितंबर को हिमालय दिवस के अवसर पर “यह कैसा हिमालय दिवस?” शीर्षक से वृहद कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए जाएंगे।
इसके अलावा हर रविवार सात मोड़ पर पेड़ कटान के विरोध में प्रदर्शन और जागरूकता अभियान जारी रखने की घोषणा की गई है।
सरकार से सड़क चौड़ीकरण का फैसला वापस लेने की मांग
प्रेस वार्ता के अंत में सभी वक्ताओं ने सरकार से पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सड़क चौड़ीकरण के फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि मांग नहीं मानी गई तो आंदोलन को और तेज तथा व्यापक किया जाएगा।
प्रेस वार्ता में जया सिंह, इरा चौहान, रूचि सिंह, अनीश लाल, संजय, वासु खन्ना, शिल्पी और कनीश उपस्थित रहे।



